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उत्तराखण्ड का लोकाचार –

उत्तराखण्ड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अधिकतर जनसंख्या करबे, ग्राम, पर्वतीय क्षेत्र, घाटियों आदि में दूर-दूर निवास करती है। जहाँ परस्पर घनिष्ठ सम्पर्क का अभाव है। अतः धर्म, भाषा, संस्कृति, खानपान, रहन-सहन, वेशभूषा, मान्यताएं, लोक देवी-देवता, पूजा, अनुष्ठान, संस्कारों आदि की दृष्टि से भिन्नताएँ हैं। अतः समाज में प्रचलित प्रथाओं और परम्पराओं में भी भिन्नताएँ होना स्वाभाविक है।

प्रत्येक समाज की तरह यहाँ के समाज में भी विभिन्न परम्पराएँ, लोकरिवाज, सामाजिक संस्कार समाहित हैं। प्रथा परम्परा की विविधता ही यहाँ की लोक संस्कृति का वैशिष्ट्य है। उत्तराखण्ड में परिवार का गठन संयुक्त परिवार मूलक और पितृ सत्तात्मक है। परिवार में तीन-तीन पीढ़ियाँ संयुक्त रूप से निवास करती हैं। किन्तु वर्तमान में व्यवसाय की तलाश में लोग घर से बाहर निकल रहे हैं जिस कारण एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है। राज्य की विभिन्न लोक परम्पराओं को निम्न बिन्दुओं के माध्यम से जाना जा सकता है।

उत्तराखण्ड का लोकाचार
उत्तराखंड पर्यटन | संपूर्ण जानकारी

उत्तराखण्ड के प्रमुख संस्कार –

संस्कारों का विधान व्यक्ति के शरीर को परिष्कृत अथवा पवित्र बनाने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि वह वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के लिए उपयुक्त बन सके। ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जन्म से असंस्कृत होता है, किन्तु संस्कारों के माध्यम से वह सुसंस्कृत हो जाता है। इनसे उसमें अन्तर्निहित शक्तियों का पूर्ण विकास हो पाता है तथा वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है। संस्कार हिन्दू जीवन-पद्धति के अभिन्न अंग हैं। संस्कारों की षोडश संख्या ही लोकप्रिय हुई। उत्तराखण्ड के संस्कार तथा त्यौहार वेदों की परम्परा पर चले आ रहे हैं।

उत्तराखण्ड के प्रमुख संस्कार निम्नलिखित हैं –

गर्भाधान –

सन्तान प्राप्ति हेतु रजोदर्शन के पश्चात् देव पूजन कर, रात्रि के तीसरे पहर शुभ दिन सहवास किया जाता था। ऋतुकाल के बाद की चौथी से सोलहवीं रात्रियाँ गर्भाधान के लिए उपयुक्त बताई गई हैं। गृहसूत्रों एवं स्मृतियों में चौथी रात्रि को शुद्ध माना गया है।

पुंसवन –

गर्भाधान के तीसरे माह में पुत्र प्राप्ति के निमित्त यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। पुंसवन का अर्थ है-वह अनुष्ठान या कर्म जिससे पुत्र की उत्पत्ति हो ( पुमान प्रसूयते येन कर्मणा तत्पुंसवन मीरितम)। इस संस्कार के माध्यम से उन देवताओं को पूजा द्वारा प्रसन्न किया जाता था, जो गर्भ में शिशु की रक्षा करते थे। चन्द्रमा के पुष्य नक्षत्र में होने पर यह संस्कार सम्पन्न होता था, क्योंकि यह पुत्र प्राप्ति के लिए उपयुक्त माना गया।

सीमन्तोन्नयन –

गर्भाधान के चौथे से आठवें मास तक यह संस्कार सम्पन्न होता है। इसमें स्त्री के केशों (सीमान्त) को ऊपर उठाया जाता था। ऐसी अवधारणा थी कि गर्भवती स्त्री के शरीर को प्रेतात्माएँ नाना प्रकार की बाधा पहुंचाती है, जिनके निवारण के निमित्त कुछ धार्मिक कृत्य किए जाने चाहिए। इसी उद्देश्य से इस संस्कार का विधान किया गया।

इसके माध्यम से गर्भवती नारी की समृद्धि तथा भ्रूण की दीर्घायु की कामना की जाती थी। स्त्री अपने केशों में सुगन्धित तेल डालकर यज्ञ मण्डप में प्रवेश करती थी। यहाँ वेद मन्त्रों के उच्चारण के बीच उसका पति उसके बाल ऊपर उठाता था। गर्भिणी स्त्री के शरीर पर एक लाल चिह्न बनाया जाने लगा जिससे भूत, प्रेतादि भयभीत होकर दूर रहें। इस संस्कार के साथ स्त्री को सुख तथा सान्त्वना प्रदान की जाती थी।

जातकर्म –

शिशु के जन्म के समय जातकर्म संस्कार सम्पन्न होता था। यह सामान्यतः बच्चे के नाल काटने से पूर्व किया जाता था। नाल काटने के पश्चात् बच्चे को मधु तथा घृत चटाया जाता था, फिर वह माँ का स्तनपान करता था।

नामकरण (नामहोम)-

बच्चे के जन्म के दसवें या बारहवें दिन नामकरण संस्कार होता था। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार इस संस्कार के निमित्त शुभ तिथि, नक्षत्र एवं मुहूर्त का चयन किया जाता था।

निष्क्रमण –

बच्चे के जन्म के तीसरे अथवा चौथे माह में यह संस्कार सम्पन्न होता था, जिसमें उसे प्रथम बार घर से बाहर निकाला जाता था।

अन्नप्राशन –

बच्चे के जन्म के छठे माह में अन्नप्राशन नामक संस्कार होता था, जिसमें प्रथम बार उसे पका में हुआ अन्न खिलाया जाता है। इसमें दूध, घी, दही तथा पका हुआ चावल खिलाने का विधान है। इस संस्कार का उद्देश्य यह है कि बच्चा माँ का दूध छोड़कर अन्नादि से अपना निर्वाह कर सके।

चूड़ा करण (चौलकर्म) –

इस संस्कार में पहली बार बालक के बाल काटे जाते हैं। गृहसूत्रों के अनुसार जन्म के प्रथम वर्ष की समाप्ति अथवा तीसरे वर्ष की समाप्ति से पूर्व यह संस्कार सम्पन्न किया जाता है।

कर्णवेध –

इस संस्कार में बालक का कान छेदकर उसमें बाली अथवा कुण्डल पहना दिया जाता था। सुश्रुत ने इसका उद्देश्य रक्षा तथा अलंकरण बताया है।

विद्यारम्भ –

इसमें बच्चे को अक्षरों का बोध कराया जाता है।

उपनयन –

चपनयन का शाब्दिक अर्थ है-समीप ले जाना। प्राचीन हिन्दू संस्कारों में उपनयन का सबसे अधिक महत्त्व था, जिसके माध्यम से बालक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता या वस्तुतः उसके बौद्धिक उत्कर्ष का आरम्भ इसी संस्कार से होता था।

केशान्त अथवा गोदान –

गुरु के पास रहकर अध्ययन करते हुए विद्यार्थी की सोलह वर्ष की आयु में प्रथम दाढ़ी-मूंछ बनवाई जाती थी। इसे केशान्त संस्कार’ कहा गया है। इस अवसर पर गुरु की एक गाय दक्षिणा स्वरूप दी थी। इसी कारण गोदान संस्कार की भी संज्ञा प्रदान की गई है। इस संस्कार के माध्यम से विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य जीवन के व्रतों की एक बार पुनः याद दिलाई जाती श्री जिन्हें पालन करने का वह पुनः व्रत लेता था।

समावर्तन –

गुरुकुल से शिक्षा समाप्त कर लेने के पश्चात् विद्यार्थी जब अपने घर लौटता था तब समावर्तन संस्कार होता था। इसका शाब्दिक अर्थ है- गुरु के आश्रम से स्वगृह को वापस लौटना। इसे स्नान भी कहा गया है, क्योंकि इस अवसर पर स्नान सबसे महत्त्वपूर्ण था। इसी के बाद विद्यार्थी स्नातक बनता था। समावर्तन संस्कार व्यक्ति को गृहस्थाश्रम में प्रवेश की अनुमति प्रदान करता है।

विवाह –

यह प्राचीन हिन्दू समाज का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्कार है, जिसकी महत्ता आज भी विद्यमान है। गृहस्थाश्रम का प्रारम्भ इसी संस्कार से होता था। विवाह एक अनिवार्य संस्कार है।

महाव्रत –

गृहस्थ आश्रम को त्यागकर वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्टि होने का प्राचीन नियम था। अब यह समाप्त हो गया है।

अन्त्येष्टि –

यह संस्कार संसार सागर से तरने के लिए किया जाता है। शव को श्मशान भूमि में पहुँचाकर उसकी अन्त्येष्टि क्रिया की जाती है। 12वें दिन पीपल पानी संस्कार सम्पन्न होता और भोज प्रबन्ध होता है।

उत्तराखण्ड में धर्म –

उत्तराखण्ड में विभिन्न सम्प्रदायों के लोग रहते हैं जिनके अलग-अलग विभिन्न ईष्टदेव हैं। यहाँ लोक देवताओं की मान्यता वैदिक और पौराणिक देवी देवताओं से अधिक है।

प्रकृति के सुन्दर- असुन्दर, परुष-मधुर, मोहक भयावह दोनों ही रूपों ने जहाँ जन-जन में उल्लास और आनन्द का संचार किया है वहीं असुरक्षा, आपदा तथा संकट का भयपूर्ण वातावरण का भी निर्माण किया है। यहाँ विशाल पर्वत, गहरी घाटियाँ, सदाबहार नदियाँ, विशाल वृक्ष, घने वन आदि प्राकृतिक कारकों के कारण जन सामान्य इनमें किसी दिव्य शक्ति का वास मानता है तथा विभिन्न स्थानीय पूजा विधियों से इन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करता है तथा ज्ञान के अभाव में जादू-टोने का भी प्रयोग वह अपने ईष्ट को प्रसन्न करने के लिए करता है।

यहाँ के निवासियों की धर्म में अनन्य आस्था है। यहाँ के मेले, खेल, मन्दिर, तीज-त्यौहार, उत्सव, कला साहित्य, नृत्यसंगीत तथा क्षेत्रीय देवता आदि सभी धर्म से जुड़े हैं।

प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय –

उत्तराखण्ड प्राचीन काल से ही यक्ष-गन्धर्व, किन्नर आदि देवताओं का निवास स्थान रहा है। धर्म के प्रति अटूट आस्था और सम्पूर्ण प्रान्त के देवी-देवतामय होने के कारण इसे ‘देवभूमि’ भी कहा जाता है। वैदिक और पौराणिक धर्म, शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, नाथ आदि के साथ यहाँ अनेक धर्म व सम्प्रदाय समभाव से रहते हैं जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं।

हिन्दू धर्म –

ब्रह्म सम्प्रदाय – चम्पावत के बालेश्वर मन्दिर में। अल्मोड़ा में कुमाऊँ का पावनेश्वर मन्दिर, राजस्थान के पुष्करराज के बाद भारत में ब्रह्मा का दूसरा मन्दिर है।

शैव सम्प्रदाय – (केदारखण्ड व मानसखण्ड) हिमालयी क्षेत्र को शिव क्षेत्र कहा जाता है। भोटिया जनजाति शिव की पूजा ‘स्यङ् सै (महान् देव) के रूप में करते हैं। गोपेश्वर, जागेश्वर, बागेश्वर, बालेश्वर, कमलेश्वर मणिमहेश, विश्वनाथ, बैजनाथ, केदारनाथ आदि स्थानों पर शिव मन्दिर निर्मित किए गए।

वैष्णव सम्प्रदाय – विष्णु भगवान ने नरनारायण के रूप में बद्रिकाश्रम में तपस्या की थी। यहाँ विष्णु मन्दिर के साथ-साथ राम, कृष्ण, सीता, हनुमान, लक्ष्मी आदि वैष्णव कुल के देवी-देवताओं के मन्दिर हैं।

शाक्त सम्प्रदाय – शक्ति की उपासना करने वाले शाक्त कहलाते हैं। कालीमठ, बूढ़ा भरसार, उल्कादेवी, पाषाण देवी में शक्ति की शिला रूप में पूजा होती है। उत्तराखण्ड में बाराही ( देवीधूरा-चम्पावत), कालीमठ (चमोली गढ़वाल), सुरकण्डा (टिहरी गढ़वाल), राजराजेश्वरी ( श्रीनगर- पौड़ी), धारी देवी (रुद्रप्रयाग), कोटभ्रामरी (कत्युर-बागेश्वर), हाटकाली (गंगोली हाट-पिथौरागढ़) देवियों के सिद्धपीठ हैं।

सौर सम्प्रदाय – सूर्य के उपासक सौर सम्प्रदायी कहलाते हैं। शकों, कुषाणों तथा कत्यूरियों ने इस सम्प्रदाय को बढ़ावा दिया। पिथौरागढ़ के चौपाता सूर्य मन्दिर तथा अल्मोड़ा का कटारमल सूर्य मन्दिर इस सम्प्रदाय की पुष्टि करता है।

नाग सम्प्रदाय – नौ नागों के अतिरिक्त नाग शासकों (मरणोपरान्त) की भी पूजा होती है। उत्तराखण्ड में नाग मन्दिरों की संख्या 90 से अधिक है जिनमें वीरणेश्वर (अनन्तनाग), उत्तराखण्ड के कुल देवता थे। अन्य नाग मन्दिरों में शेषनाग (पाण्डुकेश्वर), पुष्कर नाग (नागनाथ), तक्षकनाथ (दसौली), वासुकि नाग (नागपुर), ककेप्टक उर्गम (उर्गम), कालीनाग (पुंगराऊँ), नागनाथ (चम्पावत), विणी नाग (बेरीनाग) आदि प्रमुख हैं।

नाथ सम्प्रदाय – यह हठयोगी सिद्धों का सम्प्रदाय है। ये लोग आदिनाथ (शंकर) को अपना प्रवर्तक मानते हैं। मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ प्रसिद्ध रहे हैं। श्रीनगर के निकट गोरखनाथ गुफा, केदारखण्ड में मन्दाकिनी के तट पर ‘गोरखनाथ आश्रम, देवलगढ़ में सत्यनाथ पीठ, जागनाथ, बागनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ आदि इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध स्थल है।

पौण सम्प्रदाय – कालसी (जगत) से इस्टिका लेख मिला है।

शिवनारायणी सम्प्रदाय – कबीर व नानक के अनुयायी है। पिथौरागढ़ के बजेटी, हुडेती, बलकोटा में इस सम्प्रदाय के लोग पाए जाते हैं। मोक्षाय सम्प्रदाय समाधि व सशरीर मोक्ष पाने वाले लोग। केदारनाथ के निकट ‘मैरों झाप’

बौद्ध धर्म –

उत्तराखण्ड के तराई, भाबर, क्षेत्रों-कालसी, गोविषाण (काशीपुर) आदि में प्राचीन काल में रहे। बालेश्वर मन्दिर (चम्पावत) के निकट एक बौद्ध तीर्थ होने का उल्लेख मिला है।

जैन धर्म –

जैन तीर्थकर ऋषभदेव के पिता नाभि ने गन्धमादन पर्वत की चोटी पर तपस्या कर निर्वाण प्राप्त किया था।

सिख धर्म –

गुरुनानक ने उत्तराखण्ड के बागेश्वर, नानकमत्ता व रीठा साहब की यात्राएँ की थीं। गुरु गोविन्द सिंह ने हेमकुण्ड में तपस्या की थी।

इस्लाम धर्म –

व्यापारी और आक्रान्ता, दो रूपों में इस्लाम धर्म उत्तराखण्ड में आया। अल्मोड़ा तथा अन्य कई क्षेत्रों में ईदगाह व मस्जिदों का निर्माण किया गया है।

ईसाई धर्म –

श्रीनगर, नैनीताल, अल्मोड़ा, मसूरी आदि स्थान पर पाए जाते हैं।

खान पान –

उत्तराखण्ड राज्य की खान-पान की व्यवस्था बहुत ही सरल एवं स्वादिष्ट है। राज्य के प्राथमिक खाद्य पदार्थों में शाकाहारी व्यंजन शामिल है। राज्य में मासाहारी भोजन भी सर्व किया जाता है। राज्य में दूध और दूध से बने उत्पादों को काफी प्राथमिकता दी जाती है। आमतौर पर राज्य में शुद्ध घी या सरसों के तेल का खाना पकाने में प्रयोग किया जाता है। टमाटर का प्रयोग उत्तराखण्ड राज्य में न्यूनतम है। राज्य में व्यजनों को स्वादिष्ट बनाने के लिए मसाले के रूप में हैश के बीज प्रयोग में लाए जाते हैं।

राज्य के कुछ प्रमुख व्यंजन निम्न प्रकार हैं- फानू, काफूली, चैनसू, झोली, चटनी, रोट, बड़ी, गुलगुला, थग्या की रोटी, सवाला पलाऊ, झंगोरा की खीर आदि।

पर्व एवं तीज-त्यौहार –

लोक जीवन में तीज-त्यौहारों और पर्वों, उत्सवों का विशेष महत्त्व होता है। ये त्यौहार लोक जीवन की रीति-नीति, धर्म-कर्म, हर्ष, आनन्द, मिलन एवं आस्था व विश्वास के वाहक होते हैं। हर्ष-उल्लास के साथ-साथ लोकजन को आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन का अवसर भी प्रदान करते हैं। उत्तराखण्ड में वर्षभर में विभिन्न व्रत, उत्सव, पर्व आदि सम्पन्न होते रहते हैं। इन • सभी के लिए सामान्य बोलचाल में त्यौहार शब्द का ही प्रयोग होता है। राज्य में वर्षभर पड़ने वाले त्यौहारों की संख्या 50 से अधिक है। जिनमें से प्रमुख त्यौहारों का विवरण यहाँ प्रस्तुत है

हरेला –

श्रावण माह की संक्रान्ति को मनाया जाने वाला हरेला मुख्य रूप से कुमाऊँ में प्रसिद्ध है। इस त्यौहार के आगमन से पूर्व निर्धारित तिथि को टोकरी में पाँच, सात या नौ प्रकार के अनाज, जैसे- धान, मक्का, जौ आदि बोए जाते हैं। दसवें दिन हरेला काटा जाता है। उस दिन शिव-पार्वती, गणेश, कार्तिकेय की मूर्तियाँ बनाकर रँगी जाती हैं और इसे घर के लोगों के सिर पर रखा जाता है।

पंचमी के जौ की तरह इसे भी दूरस्थ परिजनों एवं ससुराल की लड़की को भेजने की परम्परा है। कुछ परिवारों में श्रावण चैत्र की नवरात्रि तथा दशहरे की नवरात्रियों में भी हरेला बोने की परम्परा है।

कलाई –

कुमाऊँ क्षेत्र में यह त्यौहार फसल कटने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

सारा –

यह गढ़वाल क्षेत्र में बैसाख माह में मनाया जाता है। इस दिन गाँव को बीमारी से बचाने के लिए नन्दादेवी के दूतों की अराधना की जाती है।

भिरौली –

यह पर्व सन्तान कल्याण के लिए बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है।

फूलसंग्राद / फूलदेई –

यह बसन्त के आगमन का त्यौहार है। चैत्र मास की पहली गते को बच्चे अपनी टोकरियों को फूलों से सजाकर भर लेते है और हर घर-परिवार की सुख-समृद्धि की मंगलकामना करते हुए घर-घर जाकर उनकी देहरी पर चढ़ाते हैं। यह त्यौहार एक माह तक चलता है।

फूलसंग्राद / फूलदेई के समापन पर हर घर-परिवार की ओर से चावल, मिठाई, गुड़, पैसा आदि दिया जाता है। “भागी जियलो, यो दिन भेटलो” गाती हुई बालिकाएँ फूलदेई मनाती हैं। पिथौरागढ़ में चैत्र मास की अमी को चैतौल का आयोजन होता है।

चैतौल –

पिथौरागढ़ में प्रसिद्ध इस आयोजन में स्थानीय देवता ‘देवल समेत’ की पूजा-अर्चना की जाती है। देवल को शिव का अंश माना जाता है। चैतौल प्रत्येक दूसरे / तीसरे वर्ष मनाया जाता है।

आठू –

भाद्रपद मास की सप्तमी तथा अभी को खेल चांचरी पर्व का आयोजन होता है, जिसमें अखण्ड सौभाग्य की कामना के लिए शंकर-पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है।

वैसी नामक धार्मिक आयोजन श्रावण और पौष मास में 22 दिन तक चलता है। मिरौली त्यौहार सन्तान के कल्याण के लिए मनाया जाता है। नुणाई त्यौहार देहरादून के जौनसार भावर क्षेत्र में श्रावण मास में मनाया जाता है। संवत्सर प्रतिपदा चैत्र शुक्ल के प्रथम दिन मनाया जाता है। इस दिन हरेला बोया जाता है व पंचांग सुना जाता है।

बिरूड पंचमी –

भाद्रपद (अगस्त) माह में बिरूड़ पंचमी मनाई जाती है। पाँच तरह के अनाज की छोटी-छोटी पोटलियाँ बनाकर गौरी महेश की पूजा की जाती है। पंचमी को बिरूड (पोटलियाँ) भिगो दी जाती हैं और अमी को सप्त धान्यों के पौधों से बनाए गौरी महेश के पुतलों की पूजा कर बिरूड चढ़ाए जाते हैं। कई स्थानों पर इसे आठो भी कहा जाता है। यह त्यौहार कुमाऊँ में मनाया जाता है।

घुघुतिया या उत्तरायणी –

सूर्य जब माघ माह में (14 जनवरी) उत्तरायण की ओर प्रस्थान करता है, तब घुघुतिया त्यौहार मनाया जाता है। सूर्य उत्तरायण के दूसरे दिन सुबह बच्चे कौवे को आवाज लगाकर बुलाते हैं। फिर गले में पहने घुघते या मूंगफली या नारंगी की माला को तोड़कर कौवे को देते हैं, इसलिए कहीं-कहीं इसे ‘काला कौआ त्यौहार भी कहा जाता है।

बिखौती –

बैसाख माह (14 अप्रैल) में कुमाऊँ में बैसाखी के दिन स्याल्दे बिखौती का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन गेहूँ की बालियों की पूजा की जाती है।

बग्वाल –

दीपावली को बग्वाल पर्व मनाया जाता है। वैश्यों का त्यौहार होने के बावजूद सभी वर्गों के लोग इसे मनाते हैं। इस दिन गाँवों में नौजवान हाथों में मशाल लेकर ‘मेला’ खेलते हैं।

पितृ विसर्जन –

श्राद्ध पक्ष के दौरान लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं।

पंचमी (त्यौहार) –

उत्तरैणी के बाद पंचमी का त्यौहार आता है। इस दिन जौ के पत्तों की पूजा करके मन्दिर में चढ़ाए जाते हैं। जो की इन पत्तियों को घर में सबके सिरों पर रखा जाता है। दूर रहने वाले परिवारजनों को लिफाफे में रखकर जो की पत्तियाँ डाक से भेजने की परम्परा है। विवाहित लड़की को जो की पत्तियाँ पकवान सहित ससुराल भेजी जाती हैं। कुमाऊं क्षेत्र का घुघुतिया त्यौहार मकर संक्रान्ति को मनाया जाता है।

उत्तराखण्ड को स्थानीय भाषा में दीपावली को बग्वाई या बग्वाल कहा जाता है। इस दिन पशुओं की पूजा की जाती है व रात्रि में भैला खेला जाता है। ‘फलदई त्यौहार बच्चों का त्यौहार है जो एक माह तक मनाया जाता है।बैसाखी का त्यौहार कुमाऊँ में बिखौती के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊँ क्षेत्र में ही ‘खतडुवा’ नामक पशुओं का त्यौहार मनाया जाता है।

खतड्डुवा –

कुमाऊँ में आश्विन मास की संक्रान्ति 17 सितम्बर को खतडुवा त्यौहार मनाया जाता है। यह विशुद्ध रूप से पशुओं का त्यौहार है। इस दिन गाय तथा अन्य पशुओं की सेवा की जाती है। यह जाड़े के आगमन की सूचना देने वाला त्यौहार है।

प्रत्येक घर से भांग के पेड़ पर कांस के फूल आदि लगाकर गाय के गोट में प्रत्येक जानवर के ऊपर घुमाया जाता है। यह माना जाता है कि झाड़-फूँक के माध्यम से गाय के रोग समाप्त हो गए। भाँग के पेड़ को कांस के फूल सहित गाँव के बाहर गाड़े गए चीड़ की टहनी आदि से बने ‘खतडु’ में फूँक दिया जाता है। माना जाता है कि खतडुवा जलने के साथ पशुओं के समस्त अनि भस्म हो जाते हैं। इस प्रकार खतडुवा पशुओं से सम्बन्धित त्यौहार है। कुछ क्षेत्रों में इसे ‘गे-त्यार’ या ‘ गायों का त्यौहार’ भी कहा जाता है।

नृसिंह चतुर्दशी –

बैसाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन भगवान नृसिंह जी का जन्म हुआ था। कहते हैं जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं।

वट सावित्री –

ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष में अमावस्या के दिन सुहाग के लिए महाव्रत माना जाता है। एक धागे पर 12 गाँठे बाँधते हैं, बरगद के पास पूजा करते हैं और इसे पहन लेते हैं।

गंगा दशहरा –

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा स्नान किया जाता है। ब्राह्मण लोग ‘अगस्त्यस्य पुलस्तस्य’ मन्त्र लिखकर इन्द्र के वज्र से सुरक्षा के लिए गृहद्वार पर लगा देते हैं।

हरिशयनी एकादशी –

इसे चातुर्मास का व्रत माना जाता है, क्योंकि विष्णु भगवान इस दिन क्षीर सागर में सो जाते हैं।

घी संक्रान्ति –

यह त्यौहार सितम्बर माह के मध्य में पड़ता है। चन्द्र शासनकाल में स्थानीय लोग इस दिन राजा को भेंट आदि दिया करते थे। इस दिन दूब घास की पत्तियाँ घी में डुबोकर सिर में लगाई जाती हैं। इस दिन पूरे उत्तराखण्ड में घी खाना शुभ माना जाता है।

हरताली व्रत –

तिवारी ब्राह्मण इस दिन जनेऊ पहनते हैं।

संकट चतुर्थी –

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘संकट चतुर्थी’ मनाया जाता है। तिल के मोदक बनाए जाते हैं। चन्द्रमा के उदय होने तक व्रत रखा जाता है। यह स्त्रियों का उत्तम व्रत है।

गणगौर –

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सातवीं तिथि को उमा-महेश्वर की पूजा करके स्त्रियाँ हाथ में धागा पहनती है।

दुर्वामी –

दुर्वामी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि को मनाई जाती है।

नन्दामी –

नन्दादेवी की पूजा करते हैं। यह उत्तराखण्ड की राष्ट्र देवी है।

हरियाला –

15 जुलाई हरियाला त्यौहार से 9 व 10 दिन पूर्व अन्न बोया जाता है। यह 9 अनाजों का सम्मिश्रण अंधेरे में उगाने पर पीले रंग का हो जाता है। दसवें दिन इसे काटकर देवी-देवताओ को चढ़ाया जाता है। इसे बालको को भी चढ़ाकर आशीर्वाद दिया जाता है। जीरये, जागिरये, दूब कस जड़ पनपे, श्याव कसी बुद्धि हो, स्यूकस तराण हो।

बाझर –

वर्षा ऋतु में मनाया जाने वाला यह त्यौहार थारू स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय त्यौहार है। इस अवसर पर थारू स्त्रियों गाँव के बाहर पीपल के वृक्ष के नीचे पूजा करती, भोजन पकाती तथा सुबह तक उत्सव करती हैं।

चैत्र नवरात्र –

चैत्र नवरात्र माँ दुर्गा या देवी का नौ दिनों का पावन त्यौहार है। भक्तजन नौ दिन तक व्रत रखते हैं। अनेक स्थानों पर पूजा का अनुष्ठान बलि देकर होता है। काशीपुर में बाला सुन्दरी देवी के मन्दिर में 15 दिनों के लिए एक मेला भी लगता है। यह मेला बुक्सा जनजाति के लोगों के लिए विशिष्ट है।

बिखौटी या विषुवत् संक्रान्ति –

अप्रैल के मध्य में विशेष रूप से पर्वतीय लोगों द्वारा बिखोटी या विषुवत् संक्रान्ति मनाई जाती है। इस तिथि को नाना प्रकार के विशिष्ट भोज्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इस अवसर पर हुरका की संगत में नाचते व खुशियाँ मनाते हैं।

शिवरात्रि –

शिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष के 14वें दिन भगवान शिव के सम्मान में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा पर्व है।

संवत्सर प्रतिपदा –

यह पर्व चैत्र शुक्ल में मनाया जाता है। इस दिन हरेला बोई जाती है व पंचांग सुना जाता है।

बैसी –

श्रावण व पौष माह में लगातार 22 दिन तक आयोजित होने वाला बैसी एक धार्मिक आयोजन है। गाँव के मन्दिरों में आयोजित की जाने वाली बैसी के अवसर पर गाँव के लोग सात्विक जीवन बिताते हैं। इस अवसर पर लोक देवताओं की पूजा करते हैं।

लडी घूरा का मेला –

यह मेला चम्पावत के (बाराकोट) पम्दा के देवी मन्दिर में लगता है। मेले का आयोजन कार्तिकपूर्णिमा के दिन होता है।

आठू मेला –

यह मेला चैत्र की अमी को अल्मोड़ा में लगता है। इस मेले में पशु बलि की परम्परा है।

अनन्त चौदस –

भादो सुदी चौदह को शिवजी की पूजा की जाती है।

हरिबोधिनी –

कार्तिक शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव को जगाया जाता है।

भैरवाष्टमी –

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की आठवी तिथि को काल भैरव की पूजा की जाती है।

संकट हर व्रत –

माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश पूजा करके संकट निवारण की पूजा की जाती है।

शरदोत्सव –

पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए रानीखेत में विगत कई वर्षों से सरकारी प्रयासों से शरदोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

सैण की शिवरात –

उत्तराखण्ड के शिवालयों में शिवरात्रि के दिन मेले लगते हैं। किन्तु पाली पछाऊँ स्थित भिकियासैंण तहसील मुख्यालय स्थित शिवालय में ऐतिहासिक मेला आयोजित किया जाता है। इस त्यौहार पर उत्तराखण्ड के अधिकांश भागों में शिव मन्दिरों में मेले लगते हैं। रानीबाग में चित्रशिला, केतह में तीरथ, काशीपुर में मोतेश्वर महादेव, गदरपुर में झारी महादेव, बाजपुर झारखण्डी महादेव तथा रुद्रपुर, किलपुड़ी, झारही, मुक्तेश्वर, कैलाश एवं चकरपुर के शिव मन्दिरों में लगने वाले मेले अति महत्त्वपूर्ण हैं। चकरपुर के मेले में थारू भी सम्मिलित होते हैं। में

कार्तिक पूर्णिमा (स्नान) –

कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर शारदा नदी के तट पर मेलाघाट में एक विशाल मेला लगता है। यह मेला थारू लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

नागपंचमी –

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में पाँचवे दिन नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस अवसर पर भीमताल में भीमेश्वर के मन्दिर में मेला लगता है।

कृष्ण जन्माष्टमी –

भाद्र मास के आठवें दिन कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर भक्तगण व्रत रखते हैं। इसी माह के शुक्ल पक्ष के आठवें दिन नन्दशतशी के अवसर पर नैनीताल में नैनादेवी के मन्दिर में मेला लगता है।

भिरौली त्योहार सन्तान के कल्याण हेतु मनाया जाता है। ‘सारा त्यौहारों को बीमारी से बचाने हेतु गढ़वाल क्षेत्र में बैसाख माह में मनाया जाता है। कुमाऊँ क्षेत्र में श्रवण माह के प्रथम दिन ‘हरेला’ त्योहार मनाया जाता है। जिसमें 5-7 या प्रकार के अनाजों को बोया जाता है। कलाई फसल काटने के उपलक्ष्य में मनाया जाने त्योहार है। रक्षाबन्धन के दिन जन्मोपुन्य त्योहार मनाया जाता है।

होली –

फाल्गुन (फरवरी-मार्च) को पूर्णमासी के दिन होली का त्यौहार मनाया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन छरड़ी या छरोली होती है, जिसे रंगों से खेलते हैं। कुमाऊँ में इस अवसर पर सामूहिक गायन-वादन भी किया जाता है, जिसे बैठकी होली और खड़ी होली कहते हैं। कुमाऊँ की पारम्परिक होली का यह रूप अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है।

विजयादशमी –

उत्तराखण्ड में विजयादशमी सभी धर्म के आदर्शों के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। इस दिन कई मन्दिरों में पशु बलि का भी प्रचलन है। राजपूत अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं। विजयादशमी ऐसा शुभ दिन माना जाता है जब कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। इस दिन बिना मुहूर्त के विवाह भी होते हैं। विजयादशमी से पहले नवरात्रों में रामलीलाएँ भी स्थान-स्थान पर आयोजित की जाती हैं।

ईद –

रमजान के महीने में मुस्लिम तीस दिन तक रोजा (उपवास) रखते है। रमजान का महीना समाप्त होता है, उसके दूसरे दिन ईद का पर्व मनाया जाता है। ईद मुसलमानों का महापर्व है। बच्चे, युवा, वृद्ध सभी ईदगाह जाकर नमाज पढ़ते है। तदुपरान्त खुतबा पढ़ा जाता है। खुतबा (उपदेश) पढ़ने के बाद सभी लोग प्रेमपूर्वक एक-दूसरे के गले मिलते हैं।


ईद-उल-जुहा (बकरीद) –

जिलहिज के 10वें दिन पैगम्बर इब्राहिम की याद में मनाया जाने वाला पर्व है। इन त्यौहारों के अतिरिक्त उत्तराखण्ड में मुसलमानों द्वारा बारावफात, पैगम्बर मोहम्मद साहब के जन्मोत्सव, शब-ए-बारात, आतिशबाजी करके आनन्द मनाने वाले पर्व मनाए जाते हैं।

कुछ सन्तों के उर्स समारोह, जैसे-सरवरपीर, बाले मियाँ, जहर औलिया एवं मिट्ठन शाह के मकबरों पर लगते हैं। सिख अपने गुरुओं, नानक एवं गोविन्द सिंह के जन्म दिवस हर्षोल्लासपूर्वक मनाते हैं। इस अवसर पर जुलूस निकाले जाते हैं तथा सामूहिक प्रार्थनाएँ होती है। सिखों के अन्य पर्व बैसाखी एवं लोहड़ी भी सिखों द्वारा मनाए जाते हैं।

ईसाइयों का मुख्य त्यौहार बड़ा दिन होता है, जो 25 दिसम्बर को होता है तथा ईसा मसीह के क्रूस पर चढ़ाए जाने का दिन गुड फ्राइडे है तथा ईस्टर उनके पुनर्जीवित होने की खुशी में मनाया जाता है। जैन अपने तीर्थकरों की जन्म एवं निर्वाण जयन्तियाँ मनाते हैं। महावीर स्वामी अन्तिम जैन तीर्थंकर थे। ये लोग पर्यूषण (भाद्रपद के अन्तिम दस दिन ) तथा अष्टनिकाएँ (आषाढ़, कार्तिक तथा फाल्गुन के अन्तिम आठ दिन) मनाते हैं। काशीपुर में प्रतिवर्ष एक रथयात्रा भी निकलती है। बौद्ध लोगों का मुख्य त्यौहार बुद्ध पूर्णिमा है। इसी दिन भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

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