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देहरादून के प्रमुख पर्यटन स्थल और घूमने की जानकारी

नमस्कार दोस्तों, आज में आपको उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के उन प्रमुख स्थानों की जानकारी आपको बता रहा हूं जो घुमनें के लिए काफी प्रसिद्ध स्थान हैं। जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं देहरादून उत्तराखंड का एक बहुत सुंदर शहर है और यहां पर बहुत सारी जगह हैं जहां पर काफी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक घूमने के लिए आते हैं। वह कौन-कौन सी जगह हैं देहरादून में जो प्रमुख रूप से घूमने के लिए है। तो इन जगहों के बारे में, में आज आपको बताऊंगा तो चलिए शुरू करते हैं।

देहरादून के प्रमुख पर्यटन स्थल और घूमने की जानकारी
देहरादून के प्रमुख पर्यटन स्थल और घूमने की जानकारी

देहरादून जिला गढ़वाल का एक जिला है जो उत्तर भारत में उत्तराखंड राज्य का एक हिस्सा है। जिला मुख्यालय देहरादून है, जिसने 2000 में अपनी स्थापना के बाद से उत्तराखंड की अंतरिम राजधानी के रूप में भी काम किया है। जिले में 6 तहसील, 6 सामुदायिक विकास खंड, 17 कस्बे और 764 बसे हुए गांव और 18 गैर आबादी वाले गांव हैं।

2011 तक, यह हरिद्वार के बाद उत्तराखंड में दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला जिला है। देहरादून जिले में ऋषिकेश, मसूरी, लंढौर और चकराता के प्रमुख शहर भी शामिल हैं। यह जिला पूर्व में गंगा नदी से लेकर पश्चिम में यमुना नदी तक और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में तराई और शिवालिक से लेकर उत्तर पश्चिम में महान हिमालय तक फैला हुआ है। ब्रिटिश राज के दिनों में, जिले का आधिकारिक नाम देहरादून था।

देहरादून में घूमने के लिए प्रमुख पर्यटक स्थल –

  • लाखामंडल
  • महासू देवता मंदिर हनोल
  • कालसी
  • चकराता
  • विकासनगर
  • घंटाघर
  • मसूरी
  • क्लेमेंट टाउन
  • बुद्धा टेंपल
  • सहस्त्रधारा
  • ऋषिकेश

1. लाखामंडल –

यह देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र में स्थित है जिसकी खोज जॉर्ज उबर ने की थी लाखामंडल का प्राचीन नाम मरण था तथा यह यमुना तथा लिखना नदी के संगम पर स्थित है लाखामंडल को मूर्तियों के भंडार नाम से भी जाना जाता है। लाखामंडल में राजकुमारी ईश्वर का एक शिलालेख भी है। राजकुमारी ईश्वरा पंजाब के राजा चंद्रगुप्त की पत्नी थी इस शिलालेख से पता चलता है कि यहां पर यादव का शासक था यहां उत्तराखंड शैली में निर्मित शिव मंदिर है।

लाखामंडल
लाखामंडल

जिसे लक्ष्य स्वर शिव मंदिर नाम से जाना जाता है। जिसके शिवलिंग पर जल डालने से अपना प्रतिबिंब दिखाई देता है। महाभारत काल में ‘लक्षग्राह’ का निर्माण इसी स्थान पर किया गया था। जिसमें पांडवों को जलाने का षड्यंत्र रचा गया था। लाखामंडल स्थित शिखर पर्वत को भवानी पर्वत कहा जाता है जो कि माता भवानी की तपस्थली के रूप में जाना जाता है।

दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए ‘लक्षग्राह’ बनाया था यहां दुर्योधन ने ‘लक्षग्राह’ घर में पांडवों को जीवित जलाकर साजिश रची। लेकिन किस्मत से पांडवों को शक्ति से देवता के द्वारा बचाया गया था। इसलिए भगवान शिव और पार्वती की पवित्र शक्ति का जश्न मनाने के लिए यहां एक सत्य मंदिर का निर्माण किया गया था।

2. महासू देवता मन्दिर हनोल –

यह टोंस नदी के किनारे जौनसार भाबर क्षेत्र मे स्थित है। हनौल जौनसार भाबर क्षेत्र का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है । यहां प्रसिद्ध हनौल मेला लगता हैं। हनौल का प्राचीन नाम चकरपुर था। हनौल में प्रसिद्ध महासू देवता का मंदिर स्थित है । हनोल मंदिर नागर/हण शैली में बनाया गया है। इसे हनोल मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के अन्दर चांदी की चादर पर महासु देवता तथा माता देलवाड़ी के चित्र बनाए गए हैं । हनोल मन्दिर कैलू वीर, बूठिया महासू, बौठा महासु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

महासू देवता मन्दिर हनोल
महासू देवता मन्दिर हनोल

हनोल महासू देवता मंदिर का निर्माण हूण राजवंश के पंडित मिहिरकुल हूण ने करवाया था। हणोल गांव जौनसार बावर, उत्तराखंड में स्थित यह मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं व कला और संस्कृति की अनमोल धरोहर है। कहा जाता हैं कि इसे हूण भाट ने बनवाया था। यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भाट का अर्थ योद्धा होता हैं।

3. कालसी –

यह देहरादून जौनसार भाबर के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है । यह यमुना नदी के तट पर स्थित है । इसे टॉस एवं यमुना नदी के संगम पर स्थित यमुना व अमलावा नदी तट भी माना जाता है। कालसी के प्राचीन नाम कालकूट, युगसैल, खतलिका व खटलिका एवं चित्रशिला । कालसी को जौनसार बाबर का प्रवेश द्वार कहा जाता है।

ह्वेनसांग ने इस नगर को सुधनगर नाम से उल्लेखित किया है । प्राचीन काल में यह स्थान कुणिद वंश की राजधानी थी । इसे सिरमौर की राजधानी के रूप में भी जाना जाता है । इस स्थान से मौर्य कालीन अशोक का शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो कि प्राकृत भाषा में उल्लेखित हैं, तथा इसकी लिपि ब्राह्मी है ।

कालसी शिलालेख
कालसी शिलालेख

महाभारत काल में यह क्षेत्र राजा विराट का राज्य क्षेत्र था। कालसी के शिलालेख में 14 लेखों का समावेश हैं । इसमें उत्तराखण्ड के लोगों को पुलिंद कहा गया है, तथा उत्तराखण्ड को अपरान्त कहा गया है। 1860 में जॉन फॉरेस्ट ने कालसी के शिलालेख की खोज की थी। 1953-54 में खुदाई से ईट नam वेदी भी मिली है । यह संस्कृत में उल्लेखित यहां युगसैल नामक राज्य के वार्षगण्य वंश के शीलवर्मन के चौथे अश्वमेघ यज्ञ के अवशेष के रूप में जाना जाता है। यहां कालसी के स्तूपों और देव मंदिरों को 1254 ई० में सुल्तान नसरूद्दीन (गुलाम वंश का आखिरी शासक ) ने नष्ट करवाया था ।

4. अशोक शिलालेख –

कालसी जनपद-देहरादून मगध के मौर्य वंशी सम्राट अशोक (273 ई०पू० 232 ई०पू०) ने अपनी चैदह राजाज्ञाओं को इस शिलालेख पर उत्कीर्ण करवाया जिसे जान फारेस्ट द्वारा सन् 1860 में प्रकाश में लाया गया। इस अभिलेख की भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी है। यह अभिलेख बौद्ध-धर्म के मुख्य सिद्धान्तों का संग्रह है जिसमे अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है।

अशोक शिलालेख
अशोक शिलालेख

सम्राट अशोक ने इस राजाज्ञा में नैतिक तथा मानवीय सिद्धान्तों का वर्णन किया है, यथा जीव हत्या निशेध, जन साधारण के लिए चिकित्सा व्यवस्था, कुपें खुदवाने, वृक्ष लगवाने, धर्म प्रचार करने. माता-पिता तथा गुरू का सम्मान करने, सहनशीलता तथा दयालुता आदि श्रेष्ठ मूल्यों का प्रचार करने का निर्देश दिया है। 1 लेख के अंत में पांच यवन राजाओं का भी वर्णन किया गया है।

5. चकराता –

प्रचलित कथा के अनुसार जौनसार बावर की चकराता छावनी में जहाँ वर्तमान में पोलो ग्राउंड किसी समय एक झील हुआ करती थी। चकोरों का एक समूह इसके पानी से प्यास बुझाने के लिए यहां आया करता था । इसीलिए यहां के लोग इसे चकोर घाट कहने लग गये कालान्तर में यही नाम बिगड़ता – सुधरता चकराता या चकरौता हो गया। चकराता को पहाड़ो का राजा नाम से प्रसिद्ध है। चकराता छावनी की स्थापना 1866 में की गई, किन्तु सेना 1869 में कर्नल ह्यूम के अधीन 55 वीं रेजीमेंट के रूप में यहां बसी।

चकराता
चकराता

6. मसूरी (पहाड़ों की रानी ) –

मसूरी का नाम मसूर की दाल (वनस्पति) के कारण मसूरी पड़ा। मसूरी को निम्न उपनामों से भी जाना जाता है – पहाड़ों की रानी, पर्वतों की रानी, दून के ताज, गंगोत्री व यमनोत्री मंदिरों का प्रवेश द्वार तथा भारत का एडिनबरा । मसूरी के संस्थापक आयरिश अफसर कैप्टन यंग ने की थी। कैप्टन यंग ने मसूरी की खोज 1823 में की थी । अंग्रजों ने मसूरी की भूमि को टिहरी नरेश सुदर्शन शाह से 4 मार्च 1820 को 80 वर्षों हेतू पटटे पर खरीदी थी।

मसूरी (पहाड़ों की रानी )
मसूरी (पहाड़ों की रानी )

मसूरी उत्तराखण्ड की सबसे प्राचीन नगरपालिका के रूप में भी मसूरी को जाना जाता है । इसकी स्थापना 1842 मे की गयी थी। 1826-27 में मसूरी पहली इमारत मलिंगार होटल बनी थी। 1827 में कर्नल व्हिस ने द पार्क को स्थापित किया था। 1827 में मसूरी में कैप्टन यंग द्वारा एक छावनी लंढोर छावनी बसाई गयी थी।

मसूरी की सबसे ऊंची चोटी लाल टिब्बा है। हैप्पी वैली मसूरी मे स्थित है। शीत ऋतु मे मसूरी मे विंटर कार्निवाल का आयोजन किया जाता है । मसूरी में विंटर लाइंग नामक प्राकृतिक घटना भी होती है। 1832 में भारत के पहले सर्वेयर जनरल एवरेस्ट ने द पार्क नाम से अपनी कोठी बनायी थी।

गनहिल –

यह मसूरी की rakhand सबसे ऊंची चोटी है। इसकी ऊंचाई 2122 मीटर है। तोपटिब्बा मसूरी से गनहिल तक रोपवे द्वारा
पहुचा जा सकता है । यह रोपवे 1970 में बनाया गया था ।

George Everest पार्क –

1833 में George Everest जो कि ब्रिटिश सेना के अधिकारी थे, के द्वारा मसूरी स्थित हाथी पांव नामक स्थान पर डेरा डाला गया। तब से यह स्थान एवरेस्ट पार्क नाम से जाना जाता है । जॉर्ज एवरेस्ट को कम्पास वाला आदमी भी कहा जाता है । भारत में भू गणितीय सर्वेक्षण की नींव रखने का श्रेय भी एवरेस्ट को ही जाता है।

George Everest पार्क
George Everest पार्क

मसूरी में दर्शनीय स्थल –

विश्व में स्विट्जरलैंड के अलावा मसूरी में विंटरलाइन का मनोरम दृश्य जनवरी माह में दिखता है। मसूरी में हार्डी प्रपात व भट्टा फाल जल प्रपात है। मसूरी में कैमल बैंक 3 किमी0 लम्बा रोड है और माल रोड़ और झंडी पानी फाल भी मसूरी में है। लंढौर बाजार मसूरी में है लंढौर बाजार मसूरी का यह सबसे पुराना बाजार है।

मसूरी में क्लाउडस एंड बंगला जो 1838 में बनाया गया था। मसूरी में नागदेवता का मंदिर है। मसूरी में ज्वालाजी का मंदिर विनोग पहाड़ी पर है। संतरा देवी का मंदिर मसूरी – कैम्पटी फाल मार्ग पर हैं। मसूरी में म्यूनिसिपल गार्डन या कंपनी गार्डन का निर्माण फाकनर लोगी ने किया, इसे आजादी से पहले बॉटनिकल गार्डन नाम से जाना जाता था।

7. ऋषिकेश –

ऋषिकेश के उपनाम –

  • संतनगरी,
  • योग राजधानी,
  • सागी की जगह,
  • योग की वैश्विक राजधानी
ऋषिकेश
ऋषिकेश

ऋषिकेश के प्राचीन नाम –

कुब्जाम्रक केदारखण्ड तथा वीरभद्र हैं।

चारो धामो के प्रवेश द्वार, गढ़वाल हिमालय का प्रवेश द्वार ऋषिकेश गंगा तथा चन्द्रभागा नदी के संगम पर स्थित है। ऋषिकेश को ऋषि मुनियों की तपस्थली तथा आध्यात्मिक चेतना केंद्र के रूप में जाना जाता है । प्राचीन काल में अनेक ऋषियों की तपस्थली होने के कारण इस स्थान का नाम ऋषिकेश पड़ गया। रैभ्य ऋषि ने इस स्थल पर इंद्रियों को जीतकर ईश्वर को प्राप्त किया था ।

इस स्थान का नाम पहले हृषिकेश (इन्द्रियों का स्वामी- विष्णु) तथा बाद में यह ऋषिकेश हो गया। केदारखण्ड पुराण के अनुसार ब्रह्मकुण्ड के बाद कुब्जाम्रक तीर्थ क्षेत्र प्रारम्भ होता है जो वर्तमान का ऋषिकेश है। कश्मीर के राजा लालितादित्या मुक्तापीठ ने यहां अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था । ऋषिकेश, देहरादून, टिहरी तथा पौड़ी गढ़वाल की सीमा पर स्थित हैं। ऋषिकेश के समीप चंडी पर्वत को महाराजा उषीनर के नाम पर उषीनर पर्वत नाम से जाना जाता है।

ऋषिकेश के प्रमुख दर्शनीय स्थल –

तपोवन –

तपोवन टिहरी जनपद में स्थित है । तपोवन का उपनाम सुभिक्षपुर है। तपोवन में ही लक्ष्मण जी ने अपने अंतिम समय में तपस्या की थी इसलिए लक्ष्मण की तपस्थली के रूप में भी तपोवन को जाना जाता है। तपोवन ऋषिकेश के उत्तरी छोर पर लक्ष्मण झूला के पास स्थित (इसकी स्थापना का श्रेय सुभिक्षराज देव को जाता है ।

त्रिवेणी घाट –

यह ऋषिकेश में स्थित एक प्रमुख स्नान घाट है। यह स्थान गंगा आरती के लिए प्रसिद्ध है।

भरत मंदिर –

ऋषिकेश के प्राचीन मंदिर के रूप में इसे जाता जाता है । यह त्रिवेणी घाट के पास स्थित है। यह दशरथ पुत्र भरत तपस्थली भी है।

शिवानंद झूला –

यह ऋषिकेश में स्थित है। यह झूला स्वर्गाश्रम के निकट गंगा नदी पर स्थित है।

नीलकंठ महादेव मंदिर-

यह मंदिर पौड़ी जनपद मे स्थित है लेकिन इसे ऋषिकेश के प्रमुख तीर्थस्थलों के रूप में जाना जाता • यह गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर शुम्भ व निशुम्भ पर्वतों के मध्य में स्थित है।

पशुलोक आश्रम-

यह आश्रम ऋषिकेश मंदिर में स्थित है । गांधी जी की शिष्य मीराबहन द्वारा इस आश्रम की स्थापना की गयी थी।

8. घण्टाघर देहरादून –

इसकी नींव 24 जुलाई 1948 में रखी गयी। घण्टाघर की नींव तत्कालीन राज्यपाल सरोजनी नायडू ने रखी। घण्टाघर का उद्घाटन 1953 में लाल बहादुर शास्त्री ने किया। क्लॉक टावर को पहले बलबीर टॉवर के नाम से जाना जाता था। क्लॉक टावर की ऊँचाई 85 फीट है। इसका आकार षट्भुज है।

घण्टाघर देहरादून
घण्टाघर देहरादून

9. भारतीय वन अनुसंधान संस्थान FRI (एफ. आर. आई) –

यह देहरादून में स्थित है। 1906 में इसकी स्थापना की गयी थी। 2006 मे FRI ने अपने 100 साल पूरे किए। भारत में वन विभाग की स्थापना 1864 में की गई थी व इसके प्रथम महानिदेशक डॉ डिट्रिच ब्रांडिश थे । इनकी ही सलाह पर देश के प्रथम वन महाविद्यालय की स्थापना 1878 मे देहरादून में की गयी। 1884 में इसका नाम इम्पीरियल फॉरेस्ट स्कूल रखा गया ।

fri देहरादून
fri देहरादून

1906 में इम्पीरियल वन अनुसंधान संस्थान के रूप में मान्यता मिली व आजादी के बाद इसे भारतीय वन अनुसंधान संस्थान के रूप में जाना जाता है। FRI के मुख्य गेट का नाम ब्रांडिश गेट हैं । FRI भवन का निर्माण 1921 में जेम्स ब्रूम ( ब्लूमफील्ड) द्वारा किया गया। यह भवन ग्रीक रोमन शैली में बना हुआ है। 1991 मे इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।

10. सहस्त्रधारा –

सहस्त्रधारा देहरादून से आगे पहाड़ों में घने जंगलों के बीच स्थित है। देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी व उत्तरी भारत के पश्चिमोत्तर उत्तरांचल राज्य में स्थित देहरादून से सहस्त्रधारा 11-12 किलोमीटर दूर है। यह एक पिकनिक स्पॉट है लेकिन यहाँ का मुख्य आकर्षण वे ग़ुफाएँ हैं जिनमें लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी गंधक युक्त होता है, जिसके उपयोग से चमड़ी के दर्द ठीक हो सकते हैं। पहाड़ी से गिरते हुए जल को प्राकृतिक तरीक़े से ही संचित किया गया है।

सहस्त्रधारा
सहस्त्रधारा

थोड़ी दूर पहाड़ी पर आगे चलने पर पहाड़ी के अन्दर प्राकृतिक रूप से तराशी हुई कई छोटी छोटी ग़ुफा है जो बाहर से तो स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती किंतु इन ग़ुफा में जब प्रवेश करते है तो उनकी छत अविरत रिमज़िम हलकी बारिश की बौछारों की तरह टपकती रहती है। यहाँ स्थित धाराओं के अनेक समूहों को सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाता है। गर्मियों में तपिश से बचने के लिए हर साल सैंकडों की संख्या में लोग यहाँ आते हैं। यह स्थान प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रिय स्थानों में भी रहा है।

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