ऋषिकेश में घुमनें की जगह
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ऋषिकेश में प्रमुख पर्यटन स्थल | ऋषिकेश से हरिद्वार की दूरी

सन्त महात्माओं की नगरी :- ऋषिकेश

हरिद्वार से 24 कि०मी० की दूरी पर गंगा नदी के तट पर प्रकृति की गोद में बसा हुआ धार्मिक नगर है ऋषिकेश। प्राचीन काल से ही यहाँ गंगा किनारे, ऋषि, मुनियों का निवास रहा है। ऋषिकेश गंगा और चन्द्रभग्गा नदी के संगम पर बसा हुआ है। हरिद्वार से कभी यह दूर बसा हुआ नगर प्रतीत होता था किन्तु आज हरिद्वार व ऋषिकेश एक दूसरे से मिल गये हैं । कब ऋषिकेश आता है कब हरिद्वार यह महसूस ही नहीं होता है।

ऋषिकेश नगर रेल और सड़क मार्ग से हरिद्वार से जुड़ा हुआ है। पुराणों में ऋषिकेश का उल्लेख कुब्जाभ्रक के नाम से आता है। यह एक छोटा सा नगर अवश्य है किन्तु अपने विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण अपना अलग ही महत्व रखता है। इसे सन्त महात्माओं और मंदिरों की नगरी के रूप में भी जाना जाता है।

ऋषिकेश में तीन जनपद देहरादून, टिहरी एवं पौड़ी गढ़वाल की सीमायें मिलती हैं ऋषिकेश से लगा हुआ मुनि की रेती नामक स्थान, चन्द्रभग्गा नदी के पार वाला क्षेत्र है जो ऋषिकेश में ही शामिल है किन्तु यह क्षेत्र टिहरी जनपद में आता है । इसकी सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था टिहरी जिलाधीश के अधीन है। गंगा के पार वाला गीता भवन, परमार्थ निकेतन, भूतनाथ मंदिर वाला क्षेत्र पौढ़ी गढ़वाल जिले में है। इसकी प्रशासनिक व्यवस्था पौढ़ी जिलाधीश के अधीन है । इसके अलावा सभी स्थान देहरादून जनपद में आते हैं। खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों वाला गंगा के तट पर बसा हुआ धार्मिक नगर ऋषिकेश देहरादून क्षेत्र के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है।

ऋषिकेश योग –

स्थली के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है यहाँ विश्व स्तर के कई प्रसिद्ध योग आश्रम हैं। इसी कारण इसे लोग योग राजधानी के रूप में भी पुकारने लगे हैं। यहाॅ शिवानन्द नगर में डिवाइन लाइफ सोसाइटी, मुनी की रेती पर कैलाश आश्रम, ओमकार नन्दा आश्रम है इसके अलावा ऋषिकेश में योग निकेतन, स्वर्गाश्रम, महेश योग आश्रम तथा स्टेशन रोड पर योग साधना सेन्टर स्थित है। ऋषिकेश में प्रतिदिन देश-विदेश से सैकड़ों की संख्या में पर्यटक योग साधना हेतु आते हैं। ऋषिकेश में गंगा तट पर योग ध्यान की प्रवृत्तियों को बढावा देने हेतु कई संस्थायें समय-समय पर योग सम्बन्धी शिविरों का आयोजन करती हैं

ऋषिकेश से ही उत्तराखण्ड के चारों धाम, बद्रीनाथ, केदारनाथ यमुनोत्री, गंगोत्री की यात्रा प्रारम्भ होती है, ऋषिकेश से मोटर मार्ग द्वारा ये चारों पवित्र धाम जुड़े हुये है । यहीं से सिखों के पवित्र धाम हेमकुण्ड साहब की भी यात्रा प्रारम्भ होती है। ऋषिकेश में दर्शन करने योग्य कई मंदिर, आश्रम, मठ, धर्मशालायें, योगकेन्द्र है इनमें से निम्न दर्शनीय स्थल मुख्य है :

लक्ष्मण झूला –

ऋषिकेश में गंगा नदी के ऊपर बना हुआ यह लोहे का पुल जिसे लक्ष्मण झूला के नाम से पुकारा जाता है जिसका निर्माण 1939 में हुआ था इस पर गुजरने से यह झूलता हुआ महसूस होता है । यहाँ से गंगा नदी को देखना बहुत ही सुखद लगता है ऐसी मान्यता है। 1 कि प्राचीन काल में लक्ष्मण जी ने यहाँ जूट की रस्सी के सहारे गंगा नदी पार की थी इस पुल के निर्माण से पहले यहाँ रस्से के सहारे कण्डी द्वारा नदी पार की जाती थी आज ऋषिकेश की पहचान है लक्ष्मण झूला लक्ष्मण झूला की ऊचाई गंगा नदी के जल स्तर से लगभग 70 फीट है।

तथा इसकी लम्बाई 450 फीट है। जब इस झूले पर चलते हैं तो भय मिश्रित आनंद आता है इसे पार करने के बाद स्वार्गाश्रम पर पहुँचा जाता है । धार्मिक यात्रा करने वालों एवं पर्यटकों के विशेष आकर्षण का केन्द्र रहता है लक्ष्मण झूला ।

नीलकंठ महादेव शिवजी का यह मन्दिर ऋषिकेश से बारह कि०मी० की दूरी पर 1550 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है यह एक विशाल मन्दिर है जो प्राकृतिक रूप से मनोरम स्थल पर बना हुआ । यह साधु सन्तों का सिद्ध स्थल भी माना जाता है। यहाँ सावन भादों के महीने में श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ रहती हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन में निकलने वाले विष को शिव भगवान ने यहीं पर पिया था। विष पीने के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया था। इसी कारण इस मंदिर को नीलकंठ महादेव के नाम से पुकारा जाता है।

त्रिवेणी घाट –

ऋषिकेश का यह एक सुन्दर और आकर्षक स्थल है। इस घाट पर बैठकर गंगा की लहरों और आसपास के प्राकृतिक दृश्य देखने के लिये लोगों की भीड़ लगी है। कुब्जाम्रण नामक घाट पर

गंगा, यमुना तथा सरस्वती नामक पर्वत के तीन स्त्रोतों से जल आने के कारण इसका नाम त्रिवेणी घाट पड़ा है। शाम को यहां गंगा आरती का दृश्य देखने के लिये हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। इस घाट के दक्षिण में श्री रघुनाथ जी का मन्दिर है। इस मंदिर में दर्शन से पहले यहाँ स्थित कुण्ड में लोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इस घाट के पास ही प्राचीन भारत मन्दिर को भी देखा जा सकता है। यह ऋषिकेश का प्रसिद्ध स्नान करने का घाट है ।

रामझूला –

शिवानन्द आश्रम और स्वर्गाश्रम के बीच गंगा नदी पर स्थित यह एक झूलता हुआ पुल है इसे शिवानंद झूला के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण अभी कुछ वर्षों पूर्व ही हुआ है।

गीता भवन –

लक्ष्मण झूला से गंगा नदी पार करते ही गीता भवन दिखाई देता है। गोविन्द भवन ट्रस्ट द्वारा निर्मित कराया गया गीता भवन में गीता और रामायण पर की गयी चित्रकारी शिक्षाप्रद है। इस भवन में पौराणिक कथाओं के दृश्यों की चित्रकारी की गई है। गीता भवन के सत्संग भवन में 24 घण्टों होने वाले प्रवचन व कथा कीर्तन द्वारा लोग अपना जीवन सफल बनाते हैं।

भरत मंदिर –

ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मंदिर है भरत मंदिर। इस मंदिर को १२वी शताब्दी में आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था । यह मंदिर भगवान श्रीराम चन्द्र जी के छोटे भ्राता भरत को समर्पित है। इस मंदिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के समय नष्ट हो गया था, किन्तु भरत मंदिर की बहुत सी वस्तुओं को आक्रमण के समय से लेकर

आज तक संभाल कर रखा गया है। त्रिवेणी घाट के पास स्थित यह मंदिर भरत की तपस्थली रहा है । मंदिर के अन्दर गर्भगृह में विष्णु भगवान की शालीग्राम पत्थर पर बनाई हुई मूर्ति है । आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया श्रीयंत्र भी यहाँ दर्शन हेतु रखा गया है। मान्यता है कि भरत मंदिर में भरत के रूप में साक्षात श्री हरि निवास करते हैं।

स्वर्गाश्रम –

स्वर्गाश्रम की स्थापना बाबा काली कमली वाले संत विशुद्धानन्द जी गिरि महाराज के प्रमुख शिष्य श्री स्वामी आत्मा प्रकाश जी ने की थी यह यहाँ का सबसे प्राचीन आश्रम है । यहाँ पर बहुत सुन्दर-सुन्दर मंदिर बने हुये हैं। इस आश्रम में साधु-सन्तों एवं तीर्थ यात्रियों के ठहरने के लिये कई कुटियों का निर्माण किया गया है। यहाँ संस्कृत के ज्ञान हेतु विद्यार्थियों को निःशुल्क संस्कृत का अध्ययन कराया जाता है एवं उनके रहने एवं खाने की भी निःशुल्क व्यवस्था है । स्वर्गाश्रम का पुस्तकालय काफी बड़ा एवं सुन्दर है। इस आश्रम में आने एवं रहने से मन को शांति प्राप्त होती है यह आश्रम माँ गंगा के किनारे स्थित होने के कारण बहुत ही आकर्षक है।

वशिष्ठ गुफा –

ऋषिकेश से केदारनाथ एवं बद्रीनाथ जाने वाले मार्ग पर ऋषिकेश से लगभग २२ कि.मी. की दूरी पर स्थित है वशिष्ठ गुफा । कहा जाता है कि वशिष्ठ गुफा लगभग ३००० हजार वर्ष पुरानी है। यहाँ पर साधु सन्तों को ध्यान लगाये हुये देखा जा सकता है। भगवान श्रीराम एवं उनके समकालीन कई राजाओं के पुरोहित थे वशिष्ठ मुनि, उनका

निवास स्थान है यह । यहाँ महादेव का एक शिवलिंग भी स्थापित है। वशिष्ठ गुफा गंगा नदी के किनारे एकांत स्थान पर स्थित है।

परमार्थ निकेतन –

परमार्थ निकेतन की स्थापना स्वामी शुकदेवानंद जी के द्वारा की गई थी। यहाँ संस्कृत की उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है यहाँ निःशुल्क शिक्षा, भोजन आवास आदि की व्यवस्था है। । यहाँ लगभग 600 कमरों की अतिथि शाला है। यहाँ प्रतिदिन वर्षभर प्रवचन एवं सत्संग होता है । परमार्थ निकेतन में अन्न क्षेत्र एवं चिकित्सालय है इस निकेतन के द्वारा एक मासिक पत्रिका “परमार्थ” का भी प्रकाशन किया जाता है।

केतन की स्थापना स्वामी शुकदेवानंद जी के द्वारा गई थी । यहाँ संस्कृत की उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है। यहाँ निःशुल्क शिक्षा, भोजन आवास आदि की व्यवस्था है । यहाँ लगभग 600 कमरों की अतिथि शाला है यहाँ प्रतिदिन वर्षभर प्रवचन एवं सत्संग होता है परमार्थ निकेतन में अन्न क्षेत्र एवं चिकित्सालय है। इस निकेतन के द्वारा एक मासिक पत्रिका “परमार्थ” का भी प्रकाशन किया जाता है। |

इनके अलावा ऋषिकेश में कैलाशानन्द मंदिर, शिवानन्द आश्रम, हनुमान मंदिर, शंकराचार्य आश्रम, त्रियम्बकेश्वर मंदिर, मायाकुण्ड तपोवन, झंडीआश्रम, सोमेश्वर मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर आदि देखने योग्य स्थल है ।

इन सभी धार्मिक एवं पवित्र स्थलों के दर्शन करने के बाद धार्मिक श्रद्धालुओं की उत्तराखण्ड के चारोंधाम के दर्शन करने की लालसा और तीव्र होने लगती है। तीर्थयात्री उत्तराखण्ड की तपोभूमि में स्थित चारों धामों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह यात्रा पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर की जाती है। यात्रा यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ के क्रम में प्रारम्भ होती है। इस यात्रा में यमुनोत्री में ६ कि.मी. पैदल तथा केदारनाथ में १४ कि.मी. पैदल यात्रा करना होती है । शेष सम्पूर्ण यात्रा मोटरगाड़ियो द्वारा की जाती है ।

चार धाम की यात्रा करने वाले अधिकतर यात्री ऋषिकेश से नरेन्द्र नगर, चम्बा होकर यमुनोत्री की यात्रा करते हैं किन्तु जो यात्री पर्यटन में भी रुचि रखते हैं वह यात्री यमुनोत्री धाम की यात्रा देहरादून, मसूरी, यमुना ब्रिज, डामटा, बरकोट होकर भी यात्रा प्रारम्भ कर सकते हैं यह मार्ग भी अच्छा, सरल एवं प्राकृतिक सुन्दरता लिए हुए है, इस मार्ग से दूरी भी ज्यादा नहीं पड़ती देहरादून मसूरी मार्ग से यमुनोत्री की दूरी लगभग २२१ किलोमीटर पड़ती है । हरिद्वार से देहरादून लगभग ५४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

देहरादून शब्द का अर्थ क्या है?

हरिद्वार से देहरादून मसूरी होकर यमुनोत्री धाम की यात्रा करने से देहरादून एवं मसूरी का भी भ्रमण किया जा सकता है। देहरादून दो शब्दों देहरा + दूण से मिलकर बना है। देहरा का अर्थ होता है देवालय अथवा देवघर जबकि दूण (दून) का अर्थ होता है दो पहाड़ों के मध्य घाटी वाला स्थान। देहरादून अनेक पौराणिक गाथाओं एवं संस्कृतियों का केन्द्र रहा है यहाँ कई धार्मिक एवं पर्यटन हेतु दर्शनीय स्थान है, जैसे टपकेश्वर महादेव मंदिर, संतौला देवी मंदिर, लक्ष्मण सिद्ध, चन्द्रवाणी (गौतम कुण्ड), सांई दरार, तपोवन, सहस्त्रधारा, गुच्छूपानी, लच्क्षीबाला, मालसी डियर पार्क, फनवैली आदि इन सभी स्थानों को देखने के बाद मसूरी होते हुये यमुनोत्री धाम की यात्रा प्रारम्भ की जा सकती है।

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