पंच केदार के नाम
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पंच केदार के नाम । पंच केदार कौन-कौन से हैं?

उत्तराखंड के पंच केदार –

केदारनाथ के अलावा शिवजी के चार अन्य मन्दिर-मध्यमहेश्वर तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर हैं इन चारो मन्दिर और केदारनाथ मन्दिर को मिलाकर बनते है पंच केदार। इन पाँचों स्थानों पर भगवान केदार की पूजा अर्चना भैंसा रूपी शिव के अंगों के आधार पर की जाती है। प्रमुख धाम केदारधाम में भैंसा की पीठ के रूप में। मध्य महेश्वर में उसकी नाभि के रूप में। तुंगनाथ में उसकी भुजाएँ एवं हृदय के रूप में। रुद्रनाथ में मुख के रूप में तथा कल्पेश्वर में जटाओं के रूप में महादेव शिव विराजमान हैं। इन्ही विभिन्न रूप में उनकी पूजा अर्चना होती है।

1. केदारनाथ ( प्रथम केदार ): –

उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत पर स्थित केदारनाथ मन्दिर शिव के द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक है। इस मन्दिर का पुनरुद्धार 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने करवाया था। हिमालय के चौखम्भा शिखर की तलहटी में यह मन्दिर स्थित है। इस स्थान का जल इतना पवित्र है कि उसकी कुछ बूदों के स्पर्श से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। स्कंदपुराण के केदारखंड में भगवान शिव जी पार्वती जी से केदारखंड की महिमा का वर्णन करते हुए कहते है कि “केदारखंड पचास योजन लंबा तथा तीस योजन चौड़ा है।

केदारनाथ ( प्रथम केदार )
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केदारनाथ ( प्रथम केदार )

यह स्वर्ग जाने का सर्व श्रेष्ठ स्थान है। यह पृथ्वी के अन्य भाग से अलग है। यहाँ पशु पक्षी भी शरीर छोड़ने पर सीधे शिव-पुरी में वास करते हैं। यह क्षेत्र अनेक तीर्थों और वनों से युक्त है। यहाँ सैंकड़ो शिव लिंग तथा कई पवित्र नदियाँ प्रवाहित है। इस क्षेत्र की मंदाकिनी, मधु गंगा, क्षीरगंगा आदि नदियों में स्नान मात्र से ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

केदारनाथ जी के प्राचीन मन्दिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा कराया गया था। पौराणिक मतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रुद्रनाथ में मुख, मदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में। शिवजी की पूजा अर्चना की जाती है। केदारनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नदी बैल की सजीव मूर्ति प्रतिष्ठित है। मन्दिर में प्रवेश के बाद बाहरी प्रसाद में पार्वती, पांडव, लक्ष्मी आदि की मूर्तियाँ है। मन्दिर के अन्दर मुख्य भाग में भगवान शिव की भैंसा की पीठ जैसे रूप में पाषाण पत्थर के रूप में शिवलिंग विद्यमान है। कहा जाता है कि पांडवों द्वारा स्वंय को देख लिये जाने के अन्देशे से शिव जी ने केदारखण्ड में भैंसा रूप धारण कर लिया था।

2. मध्य-महेश्वर ( द्वितीय केदार ): –

मध्य-महेश्वर कालीमठ से पहुँचा जा सकता है। मध्य-महेश्वर में भगवान शिव की पूजा-अर्चना नाभिलिगम् के रूप में की जाती है। यह अत्यंत प्राचीन शिव मन्दिर है। इसकी बनाबट बौद्ध मंदिरों जैसी प्रतीत होती है। गुप्तकाशी से कालीमठ 8 कि.मी. दूर स्थित है। यहाँ की यात्रा बस अथवा टैक्सी से की जा सकती है कालीमठ से मध्यमहेश्वर की यात्रा पैदल की जाती है जो कि 31 कि.मी. है। मध्यमहेश्वर जाने का दूसरा मार्ग ऊखीमठ से मनसूना होकर जाता है। मनसूना से लगभग 27 कि. मी. की पैदल दूरी पर मध्य महेश्वर मंदिर स्थित है। इस मार्ग से जाने पर पैदल दूरी की बचत होती है।

मध्य-महेश्वर ( द्वितीय केदार )
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मध्य-महेश्वर ( द्वितीय केदार )

स्कन्द पुराण के अनुसार “मध्यमहेश्वर” क्षेत्र केदारपुरी से तीन योजन की दूरी पर बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्तगण मध्यमहेश्वर के दर्शन करता है वह हमेशा स्वर्ग में निवास करता है जो भक्त सच्चे मन और भक्तिभाव से यहाँ शिव की पूजा अर्चना करता है। उसे निश्चय ही सिद्धि की प्राप्ति होती है। मध्यमहेश्वर के बारे में ऐसी भी मान्यता है कि जो पति पत्नी पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिये यहां नियमानुसार पूजा पाठ करते हैं उन्हें शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति होती है।

मध्यमहेश्वर मंदिर से लगभग 450 मीटर की दूरी पर वृद्ध मध्यमहेश्वर का एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ से लगभग दो कि.मी. की दूरी पर धौला क्षेत्रपाल की एक पवित्र गुफा है। इन दोनों स्थानों पर भी कुछ यात्री आकर पूजा करते हैं।

यह मंदिर पाण्डवों द्वारा बनाया गया था। इस मंदिर के कपाट मई से अक्टूबर तक खुले रहते हैं। यहाँ दक्षिण भारत के पुजारी (रावल) पूजा अर्चना करते है। इस मंदिर के गर्भगृह में भोलेनाथ के “नाभिलिंग” सहित अनेक प्राचीन मूर्तियां हैं इस गर्भग्रह में पुजारी के अलावा और कोई प्रवेश नहीं कर सकता। तीर्थ यात्रियों को बाहर वाले कमरे से ही पूजा करना पड़ती है।

चौखम्भा पर्वत शिखर की तलहटी पर 3289 मीटर की ऊँचाई पर यह मन्दिर गंगा और मार्कण्डेय गंगा नदियों के संगम पर स्थित है। यह मन्दिर उत्तर भारतीय वास्तुकला का अद्वितीय उदाहरण है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ का जल पवित्र है। इसकी कुछ बूदों से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ के पर्वतीय ढलानों में अनगिनत फूल एवं मखमली घास से ढके हुये मैदान है जो प्राकृतिक रूप से अपनी छटा चारों और बिखेरे हुये है । शीत ऋतु में यह स्थान बर्फ से ढक जाता है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ पिघलने के पश्चात चारो ओर हरी घास की चादर बिछ जाती है। यहाँ से केदारनाथ और नीलकंठ पर्वत की चोटियां स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ पर रहने व खाने की उचित व्यवस्था है।

3. तुंगनाथ ( तृतीय केदार ):-

भारतीय महाद्वीप में हिन्दू मन्दिरों में तुगंनाथ मन्दिर सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित है तुंगनाथ क्षेत्र की पवित्रता अद्वितीय है यह मन्दिर 3680 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस मन्दिर में भगवान शिव की भैंसारूप में हृदय एवं भुजाओं की पूजा अर्चना की जाती है यह मन्दिर अत्याधिक प्राचीन मन्दिरों में से एक है। मन्दिर के अन्दर शिवलिंग है। मान्यता है कि इस शिवलिंग पर जितने कण जल चढ़ाया जाता है उतने ही सहस्त्र वर्षों तक वह मनुष्य शिवलोक में निवास करता है ।

तुंगनाथ ( तृतीय केदार )
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तुंगनाथ ( तृतीय केदार )

स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में तुंगनाथ मंदिर के धार्मिक महात्म्य के संबंध में उल्लेख है कि धर्मदत्त नामक एक विद्वान धार्मिक प्रवृत्ति का ब्राह्मण था जिसका एक पुत्र, जिसका नाम कर्मशर्मा था, जो अपने पिता से एकदम विपरीत स्वभाव का जुआरी, शराबी, परस्त्री गमन करने वाला महापापी, दुराचारी व्यक्ति था। उसके इन दुष्कर्मों को देखते हुये धर्मदत्त को मृत्यु प्राप्त हो गई। पिता की मृत्यु के बाद कर्मशर्मा ने अपने पिता की सम्पत्ति समाप्त कर डाली। संपत्ति के समाप्त होते ही कर्मशर्मा के भाई बन्धुओं एवं गांव वालों ने उसे गाँव से बाहर निकाल दिया । परिणाम स्वरूप उसे जंगल एवं निर्जन स्थान पर रहना पड़ा। एक दिन

किसी बाघ ने उसे मार डाला और उसको खा गया उसके शरीर की | हड्डियाँ मांस आदि जो शेष बचे थे उन्हें गिद्ध और कौवे खाने लगे। एक | कौवा उसके शरीर की एक मांस लगी हड्डी को लेकर उड़ गया और मांस | खाने के बाद उस कौवे ने उस हड्डी को तुंगनाथ क्षेत्र में गिरा दिया ।

इस अति पवित्र क्षेत्र में कर्मशर्मा की हड्डी के गिरते ही वह पाप मुक्त हो गया। पापमुक्त होते ही महादेव तुंगेश्वर की कृपा से उनके शिवगणों ने कर्मशर्मा को यमदूतों से छीन लिया जो कि कर्म शर्मा को यमलोक ले जा रहे थे, शिवगणों ने कर्मशर्मा को शिवलोक में पहुँचा दिया। दूसरे जन्म में पृथ्वी लोक पर आकर वह एक धर्मचारी राजा बना। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति केवल तुंगनाथ के दर्शन एक बार भी कर लेता है वह कहीं भी मृत्यु को प्राप्त करे उसे अवश्य सद्गति प्राप्त होती है।

धार्मिक मान्यताओं के आधार पर यह माना जाता है कि जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पाण्डवों के हाथों काफी बड़ी संख्या में अपने गुरुजन, परिजन आदि का नरसंहार हुआ तब पाण्डवों के इस कृत्य से महादेव शिव उनसे रुष्ट हो गए । अतः महादेव को मनाने एवं प्रसन्न करने के उद्देश्य से पाण्डवों ने तुंगनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने जब रावण का वध किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा । इस पाप से मुक्त होने के लिये उन्होंने यहाँ एक शिला पर बैठकर शिव की तपस्या की थी जिसे चन्द्रशिला के नाम से पुकारा जाता है । यह शिला तुंगनाथ मंदिर से लगभग डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई पर है जो मून माउन्टेन के नाम से भी पुकारी जाती है।

गुप्तकाशी से ऊखीमठ होकर गोपेश्वर चमोली के रास्ते पर लगभग 40 कि.मी. की दूरी पर चौपता नामक स्थान पड़ता है। यहाँ से 3 कि.मी. की दूरी पर हिमालय पर्वत पर सबसे अधिक ऊँचाई पर यह मन्दिर स्थित है। तुंगनाथ मन्दिर पर पहुँचने पर बादल आपकी स्थिति से नीचे हो जाते है । क्षण भर में ही आप अपने आपको बादलों के मध्य पायेगें । मन्दिर के चारों ओर हरी घास के कालीन जैसे फेले हुये पहाड़ एवं बांस तथा बुरांस के घने जगंल है । यहाँ ठहरने व खाने की उचित व्यवस्था नहीं है। मन्दिर में दर्शन करने के उपरांत वापस चौपता लौटना पड़ता है।

4. रुद्रनाथ ( चतुर्थ केदार ):-

रुद्रनाथ मन्दिर गोपेश्वर चोपता मार्ग पर सगर गाँव से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है यह दूरी पैदल तय करना पड़ती है।। रुद्रनाथ मन्दिर 2286 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है इस मन्दिर तक पहुँचने के लिये अत्याधिक ऊँचाई वाली पर्वत श्रेणियाँ पैदल पार करना पड़ती है। रुद्रनाथ मन्दिर के कपाट भी चार धाम के अन्य मन्दिरों की भाँति छः माह बन्द रहते हैं । कपाट बन्द होने पर रुद्रनाथ की गद्दी गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मन्दिर में लाई जाती है जहाँ शीतकाल में रुद्रनाथ की पूजा की जाती है । रुद्रनाथ मंदिर के गर्भ गृह में मुखाकृति की पूजा अर्चना की जाती है ।

रुद्रनाथ ( चतुर्थ केदार )
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रुद्रनाथ ( चतुर्थ केदार )

रुद्रनाथ मंदिर को रुद्रालय के नाम से भी जाना जाता है। इस मन्दिर के गर्भ गृह में शिव की मुखाकृति की पूजा अर्चना की जाती है। जो मनुष्य इस दुर्लभ स्थान पर आकर शिव की आराधना करते हैं वे अति श्रेष्ठ माने जाते है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव यहाँ हमेशा निवास करते हैं। जो यात्री यहाँ नियमानुसार पूजा अर्चना करते हैं उनकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

रुद्रनाथ मंदिर के पास ही नन्दी कुण्ड और नारद कुण्ड है जिनके जल से यात्री आचमन करते हैं। जबकि स्नान पास में ही स्थित बैतरणी नदी के उद्गम स्थल पर किया जाता है यहाँ पर स्नान करना अति पवित्र माना जाता है।

रुद्रनाथ का मन्दिर एक गुफा में सीधी चट्टान पर स्थापित हैं यहाँ पर गुफा को बाहर से दीवार बनाकर बंद कर दिया गया हैं। यह एक प्राकृतिक मन्दिर हैं मन्दिर के अन्दर शिवलिंग पर गुफा की छत्त से जल की बूंदे टपकती रहती हैं। शिवशंकर की इस भयावह (रौद्र) आकृति को हमेशा किसी वस्त्र से ढककर रखा जाता हैं। मन्दिर में प्रतिदिन दुर्लभ ब्रह्म कमल पुष्पों से पूजा की जाती हैं। रूद्रनाथ के धार्मिक महत्व के

सम्बन्ध एक प्रसंग है कि हिरण्याक्ष पुत्र जो कि जन्म से अन्धा शारीरिक से विक्षिप्त जिसका अंधक ने इस क्षेत्र में कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न वरदान प्राप्त किया। वरदान अंधक ब्रह्मा से वर मांगा मेरी शारीरिक दुर्बलता समाप्त जाये तथा भगवान शंकर भोलेनाथ अलावा अन्य प्राणी मुझे मार न सके। ब्रह्मा ने यह वरदान प्रदान दिया वरदान पाकर अंधक अहंकारी ओर निरकुंश गया।

वह अब सभी मनुष्यों संतों, ऋषियों-मुनियों कष्ट पहुंचाने सभी पर अत्याचार करने लगा लोग उसके अत्याचार भयभीत भागने साधु सन्तों ने जप-तप, पूजा-पाठ करना दिया। अंधक भय के कारण सभी देवी-देवता, साधु-सन्त, भगवान शंकर पास पहुंचकर विनती लगे कि उन्हें वह अंधक अत्याचारों मुक्ति प्रदान करायें। उन सभी की विनती शिवजी अंधक विनाश करके पार्वती अपने गणों के साथ इसी रुद्रनाथ में रहने लगे। इसीलिये जाता कि भी व्यक्ति आकर शिव की पूजा करते हैं मृत्यु प्राप्ति बाद उन्हें शिवलोक प्राप्ति है।

धर्मावलम्बी अपने पूर्वजों क्रिया-कर्म, तपर्ण आदि के लिये आते है। यहाँ पितरों तारने वाली बैतरणी बहती है। पांडव अपने गोत्र हत्या के पाप से छुटकारा के लिये यहाँ शिवजी दर्शन आये थे इस मन्दिर चारो ओर सूर्यकुण्ड, चन्द्रकुण्ड, ताराकुण्ड और मानसकुण्ड रुद्रनाथ पीछे ओर हिमालय की देवी, त्रिशूल और नंदाघुन्टी गगनचुम्बी पर्वतशिखर है। यहाँ पर व रहने की उचित व्यवस्था है एक मात्र धर्मशाला ही रात्रि विश्राम है ।

5. कल्पेश्वर ( पंचम केदार ):-

ऋषीकेश बद्रीनाथ धाम के रास्ते ऋषीकेश 243 कि.मी. तथा बद्रीनाथ 61 कि.मी. पहले हेलंग नामक स्थान है। यहाँ से कि.मी. सडक से हटकर कल्पेश्वर मन्दिर सड़क से यहाँ का 12 कि.मी. रास्ता पैदल करना है ।

कल्पेश्वर मन्दिर में शिवजी भैंसा आकृति में जटा के रूप में विराजते हैं । यह मन्दिर एक गुफा में स्थित है। कल्पेश्वर मन्दिर के पास ही हिरण्यवती नदी बहती हैं। यहाँ गुफा के ऊपरी भाग से शिवलिंग के ऊपर पानी टपकता रहता हैं। पाँचो केदार में से केवल कल्पेश्वर ही एक ऐसा तीर्थ है जहाँ वर्ष भर हर मौसम में शिवलिंग के दर्शन एवं पूजा अर्चना की जाती है । यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमी है यहाँ सतं महात्मा आराधना के लिये आते है। यही वह स्थान है जहाँ दुर्बासा ऋषि के शाप से मुक्त होने के लिये इन्द्र ने महादेव का पूजन किया था ।

कल्पेश्वर ( पंचम केदार )
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कल्पेश्वर ( पंचम केदार )

पुराण के अनुसार एक बार भगवान शिवशंकर के दर्शन करने हेतु इन्द्र ऐरावत हाथी पर बैठकर कैलाश पर्वत हिमालय पर गये। यहाँ पर महर्षि दुर्वासा जी भी उपस्थित थे। उन्होंने महामाया द्वारा भेंट की हुई पुष्प माला जो कि उनके पास थी उसे प्रसाद के रूप में इन्द्र को भेंट कर दिया। इन्द्र ने मन ही मन महर्षि दुर्वासा जी का उपहास करते हुये उनके द्वारा दी गई पुष्पमाला को हाथी के मस्तिष्क पर रख दिया। हाथी के ऊपर इन्द्र द्वारा माला रखे जाने को अपना घोर अपमान समझते हुये दुर्वासा ऋषि ने क्रोधित होकर इन्द्र को श्रीहीन होने का श्राप दे दिया।

श्राप के कारण इन्द्र अपने शत्रुओं द्वारा पराजित हो गये । श्राप के कारण कलयुग जैसी स्थिति बन गई। इन्द्र श्राप के कारण भयग्रस्त होकर मच्छर का रूप धारण कर अलकनंदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित इन्द्रकील पर्वत की ओर चले गये। इन भीषण परिस्थितियों को देखकर सभी देवतागण ब्रह्मा जी को साथ लेकर विष्णु भगवान के पास पहुंचे। विष्णु भगवान सहित सभी देवताओं ने इन्द्र की खोज की।

इन्द्रकील पर्वत पर इन्द्र के मिल जाने पर उनके द्वारा मच्छर का रूप त्यागने के बाद सभी देवताओं की बातों से प्रेरित होकर इन्द्र ने भगवान शंकर की अनेक प्रकार से आराधना की। इन्द्र तथा सभी देवताओं की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें अपने दिव्य रूप में दर्शन दिये तथा अपना नेत्रजल देते हुये कहा कि इसे समुद्र में डालकर समुद्र का मंथन करो तब

तुम्हें कल्पवृक्ष की प्राप्ती होगी फिर जो भी चाहोगे उसकी तुम्हें प्राप्ति हो जाएगी । भगवान शंकर के आशीर्वाद से देवताओं को कल्पवृक्ष तथा चौदह अन्य रत्नों की प्राप्ती हुई। कल्पवृक्ष की प्राप्ति के कारण ही इस स्थान का नाम कल्पेश्वर पड़ा ।

यह मन्दिर 2134 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है मन्दिर के गर्भगृह में पहुँचने के लिये एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाना पड़ता है यहाँ शिवलिंग के दक्षिण की ओर कपिल लिंग है जिसके दर्शन मात्र से ही मनुष्य शिवलोक की प्राप्ति कर लेता है। यहाँ ठहरने के लिये धर्मशाला मौजूद है।

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