केदारनाथ से बद्रीनाथ
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केदारनाथ से बद्रीनाथ कैसे पहुंचे? । केदारनाथ से बद्रीनाथ की दूरी

केदारनाथ से बद्रीनाथ यात्रा –

केदारनाथ की यात्रा करने के उपरांत तीर्थयात्री वापस गौरीकुण्ड आते है और यहाँ से अपनी अपनी गाड़ियों के द्वारा उत्तराखण्ड के सबसे महत्वपूर्ण धाम बद्रीनाथ की यात्रा प्रारम्भ कर देते है जो कि निम्नानुसार की जाती है –

केदारनाथ से बद्रीनाथ
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केदारनाथ से बद्रीनाथ

गुप्तकाशी –

केदारधाम के पास सब सुविधाओं से युक्त स्थल है गुप्तकाशी । केदारनाथ मन्दिर के अधिकांश पण्डे यही के आसपास गाँव में निवास करते हैं। यहाँ पर प्रसिद्ध अर्ध नारीश्वर का मन्दिर स्थित है। गुप्तकाशी से चौखम्बा पर्वत बहुत दूर होने पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। । यहाँ से दस कि०मी० की दूरी पर प्रसिद्ध सिद्धपीठ कालीमठ है

कुण्ड –

गुप्तकाशी 5 कि०मी० की दूरी पर कुण्ड नामक स्थान है। यहाँ से दो रास्ते है एक रास्ता रुद्रप्रयाग के लिये तथा दूसरा रास्ता (ऊखीमठ) चौपता होते हुये चमोली जाता है।

रुद्रप्रयाग –

कुण्ड से अगस्तमुनि तिलवाडा होते हुये यात्री रुद्रप्रयाग पहुँचते हैं। कुण्ड से रुद्रप्रयाग की दूरी 34 कि०मी० है यह तीर्थस्थल अलकनंदा एवं मंदाकिनी नदियों के संगम स्थल पर स्थित है इस पंच प्रयागों में से एक महत्वपूर्ण प्रयाग माना जाता है यहाँ के प्राचीन शिवमंदिर में भगवान शिव की रुद्र अवतार के रूप में पूजा अर्चना की जाती है।

कर्णप्रयाग –

रुद्रप्रयाग से 31 कि०मी० की दूरी पर अलंकनदा और पिंडारी नदियों के पवित्र संगम स्थल पर कर्ण प्रयाग नामक स्थान है । कहा जाता है कि महाभारत काल में कर्ण ने यहाँ तपस्या की थी यहाँ कर्ण मंदिर और उमा देवी मंदिर दर्शन योग्य है ।

नन्दप्रयाग –

कर्णप्रयाग से 22 कि०मी० की दूरी पर अलंकनदा एवं नंदाकिनी नदी के संगम स्थल पर नन्द प्रयाग नामक स्थान है। इस स्थान का नाम राजा नन्द के नाम पर रखा गया है के पर गोपाल मंदिर दर्शन करने योग्य है।

चमोली –

चमोली नन्दप्रयाग से 10 कि०मी० की दूरी पर स्थित है । चमोली जिला स्तर का नगर है यहाँ सभी सुविधायें उपलब्ध हैं। केदारनाथ से बद्रीनाथ जाने वाला दूसरा मार्ग जो कि ऊखीमठ चौपता, गोपेश्वर होकर आता है यहीं आकर मिलता है। यहाँ से बद्रीनाथ के लिये एक ही रास्ता बन जाता है । यहाँ पर अलकनन्दा का तटीय सौन्दर्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

जोशीमठ –

चमोली से 48 कि०मी० की दूरी पर बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ नामक स्थान पड़ता है। आदि शंकराचार्य ने अपने प्रथम मठ की स्थापना यहीं की थी जिसका नाम ज्योतिर्मठ रखा । यही नाम जोशीमठ कहलाता है। जोशीमठ में कई प्राचीन मन्दिर है। जिनमें दुर्गा मन्दिर नरसिंह मन्दिर प्रसिद्ध हैं। अधिकांश यात्री यहाँ के दर्शन करने के बाद ही बद्रीनाथ के दर्शन हेतु प्रस्थान करते हैं । भगवान विष्णु का अवतार ही नरसिंह भगवान हैं। इसी कारण जब शीतकाल में छः माह के लिये बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते है तब बद्रीनाथ भगवान की पूजा इस नरसिंह मंदिर में की जाती है। यहीं से एक मार्ग 14 कि०मी० की दूरी पर स्थित भविष्य बद्री को जाता है।

विष्णुप्रयाग –

जोशीमठ से 10 कि.मी. की दूरी पर धौली गंगा और अलकनंदा के संगम पर विष्णु प्रयाग स्थित है। यहाँ के दाईं ओर के पर्वत को नर और बाईं ओर के पर्वत को नारायण कहते है । यहाँ पर नारद मुनि ने भगवान विष्णु की पूजा की थी ।

गोविन्द घाट –

विष्णु प्रयाग से 11 कि.मी. की दूरी पर गोविन्द घाट नामक स्थान है। यहाँ अलकनंदा के तट पर विशाल गुरुद्वारा बना हुआ है। गोविन्द घाट से 20 कि०मी० की दूरी पर सिखों का पवित्र धाम हेमकुण्ड साहिब है। यहाँ सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी ने तप किया था। गोविन्द घाट से हेमकुण्ड तक की यात्रा पैदल ही तय की जाती है।

पाण्डुकेश्वर –

गोविन्द घाट से 4 कि.मी. की दूरी पर पांडुकेश्वर स्थित है। यहाँ पाण्डवों द्वारा बनाया हुआ योग बद्री भगवान का प्राचीन मंन्दिर है। ऐसी मान्यता है कि राजा पाण्डु ने यहाँ कुन्ती से विवाह किया था। यहीं पर महाराजा पाण्डू ने तपस्या की यहीं पर पाँचो पाडवों का जन्म हुआ था।

हनुमान चट्टी –

पाण्डुकेश्वर से 9 कि०मी० की दूरी पर हनुमान चट्टी नामक स्थान है यहाँ सड़क के किनारे ही हनुमान मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि यहीं पर हनुमान जी ने बद्रीनारायण भगवान की आराधना की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान बद्रीनाथ जी ने उन्हें शक्ति प्रदान की थी

बद्रीनाथ –

हनुमान चट्टी से 15 कि.मी. की यात्रा करने के बाद यात्री अलकनंदा के दाहिने तट पर बसे पवित्र धाम बद्रीनाथ धाम स्थित है। बद्रीधाम में गंगा जी अलकनंदा के रूप में बहती है। अलकनंदा आदि गंगा है जो मनुष्य इसमें स्नान करता है उसे पुण्य की प्राप्ति होती है विष्णु पदी गंगा ‘“अलकनंदा“ के दर्शन से मनुष्य के संपूर्ण कष्टों का नाश हो जाता है।

आज इस कलयुग में वह मनुष्य अत्यन्त भाग्यशाली है जो बद्रीधाम पहुंचकर भगवान विष्णु जी के मंदिर के दर्शन करता है। ऐसा माना जाता है यहां हर प्राणी विष्णु तुल्य हो जाता है। इस क्षेत्र में भयंकर पापों का नाश करने वाली अलकनंदा मौजूद है। यहां देवी-देवता, गंधर्व यक्ष, राक्षस, किन्नर सभी विष्णु जी की भक्ति में लगे रहते है।

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