केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
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केदारनाथ ज्योतिर्लिंग कथा। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है?

उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत पर स्थित केदारनाथ मन्दिर शिव के द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक है। इस मन्दिर का पुनरुद्धार 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने करवाया था। हिमालय के चौखम्भा शिखर की तलहटी में यह मन्दिर स्थित है। इस स्थान का जल इतना पवित्र है कि उसकी कुछ बूदों के स्पर्श से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। स्कंदपुराण के केदारखंड में भगवान शिव जी पार्वती जी से केदारखंड की महिमा का वर्णन करते हुए कहते है कि “केदारखंड पचास योजन लंबा तथा तीस योजन चौड़ा है।

यह स्वर्ग जाने का सर्व श्रेष्ठ स्थान है। यह पृथ्वी के अन्य भाग से अलग है। यहाँ पशु पक्षी भी शरीर छोड़ने पर सीधे शिव-पुरी में वास करते हैं। यह क्षेत्र अनेक तीर्थों और वनों से युक्त है। यहाँ सैंकड़ो शिव लिंग तथा कई पवित्र नदियाँ प्रवाहित है। इस क्षेत्र की मंदाकिनी, मधु गंगा, क्षीरगंगा आदि नदियों में स्नान मात्र से ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
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केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

केदारनाथ जी के प्राचीन मन्दिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा कराया गया था। पौराणिक मतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रुद्रनाथ में मुख, मदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में। शिवजी की पूजा अर्चना की जाती है। केदारनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नदी बैल की सजीव मूर्ति प्रतिष्ठित है। मन्दिर में प्रवेश के बाद बाहरी प्रसाद में पार्वती, पांडव, लक्ष्मी आदि की मूर्तियाँ है। मन्दिर के अन्दर मुख्य भाग में भगवान शिव की भैंसा की पीठ जैसे रूप में पाषाण पत्थर के रूप में शिवलिंग विद्यमान है। कहा जाता है कि पांडवों द्वारा स्वंय को देख लिये जाने के अन्देशे से शिव जी ने केदारखण्ड में भैंसा रूप धारण कर लिया था।

शिव महापुराण में उल्लेखित है कि कौरवों और पाण्डवों के मध्य होने वाला महाभारत युद्ध न्याय और अन्याय के मध्य तथा धर्म और अधर्म के मध्य लड़ा गया था। इस युद्ध की जिम्मेदारी केवल कौरवों की ही नहीं थी इस युद्ध की जिम्मेदारी पाण्डवों की भी थी। इस युद्ध का दुष्परिणाम समूचे राष्ट्र को भुगतना पड़ा था। युद्ध की समाप्ती के बाद जब पाण्डवों ने इस युद्ध के कारणों व परिणामों पर विचार मंथन किया तो वे अत्यन्त दुःख से व्याकुल हो उठे उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने अपने ही हाथों से अपने सगे सम्बन्धियों तथा कुल के लोगों का विनाश कर दिया।

अतः वे गोत्रहत्या तथा कुलनाश के पाप से मुक्ति प्राप्त करने के लिये बेचेन हो उठे जब उन्हें कोई मार्ग न दिखा तो वे वेदव्यास जी के पास प्रायश्चित करने के तरीके एवं पाप मुक्त होने की विधि जानने के लिये पहुँचे। वेद व्यास जी ने कहा कि संसार में हर पापी के पापों का नाश हुआ है लेकिन जिन्होंने अपने ही कुल का नाश किया हो, जो अपने बन्धुओं की हत्या के दोषी हों ऐसे प्राणी का कभी कल्याण नहीं हो सकता।

यदि तुम इस पाप से मुक्त होना चाहते हो तो केदार क्षेत्र में जाकर भगवान शिव के दर्शन, पूजन करो महादेव शिव की कृपा के बिना तुम्हें इस पाप से मुक्ति नहीं मिलेगी। व्यास जी ने कहा कि तुम सभी उस पवित्र एवं श्रेष्ठ केदारखण्ड में जाओ जहां नदियों में श्रेष्ठ नदी मंदाकिनी बहती है जहां महादेव शिव पार्वती जी के संग अपने सैकड़ों वीर गणों के साथ निवास करते हैं जहां ब्रह्मा सहित अनेकों देवता हमेशा उपस्थित रहते हैं उस महान पवित्र क्षेत्र में जाकर महादेव की वन्दना करो महादेव शिव की कृपा से ही तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिलेगी। व्यास जी से मार्गदर्शन प्राप्त कर पाण्डव महादेव शिव के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े।

सबसे पहले पाण्डव काशी पहुँचे कि महादेव शिव के दर्शन उन्हें यहीं हो जावेगें किन्तु महादेव शिव पाण्डवों के इस कुलघाती कृत्य से नाराज थे उन्होंने पाण्डवों को दर्शन नहीं दिये पाण्डव निराश होकर व्यास जी के बताये हुये केदारखण्ड क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा अर्चना एवं आशीर्वाद प्राप्त करने पहुॅचे। भगवान शिव ने जब पाण्डवों को केदा खण्ड में आते देखा तो महादेव गुप्तकाशी में जाकर अन्तर्ध्यान हो गये आगे जाकर महादेव शिव एक भैंसे का रूप धारण कर अन्य जानवरों के मध्य जाकर विचरण करने लगे।

उधर आकाशवाणी के द्वारा पाण्डवों को ज्ञात हुआ कि महादेव एक भैंसे के रूप में इन अन्य पशुओं के मध्य मौजूद है। जैसे ही महादेव शिव को यह ज्ञात हुआ कि पाण्डव उन्हें भैंसे के रूप में खोज रहे है तो वह वहां की दलदली धरती में धंसने लगे जब भीम ने देखा कि महादेव वहां से कहीं ओर जाने वाले हैं तो उन्होंने भैंसा रूपी महादेव की पूँछ पकड़ ली उसी समय सभी पाण्डव करूणापूर्व व से विनती करते हुये महादेव शिव की स्तुति करने लगे उनकी इस श्रद्धा-भक्ति एवं स्तुति से भोलेनाथ शिव प्रसन्न हो उठे।

पाण्डवों की प्रार्थना पर महादेव शिव इस केदारखण्ड में भैंसा के पृष्ठभाग की आकृति के रूप में हमेशा के लिये स्थित हो गये। पाण्डवों ने विधि विधान के साथ महादेव के इस केदारेश्वर नामक शिवलिंग की पूजा अर्चना की तब महादेव ने आकाशवाणी के द्वारा पाण्डवों को आशीर्वाद दिया कि है पाण्डवों मेरी इस पूजा से तुम्हारे सभी सकल मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे। भगवान शिव के इस भैंसा के पृष्ठ भाग की आकृति में शिवलिंग का पूजन

कर सभी पाण्डव गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पा गये। केदारधाम क्षेत्र में पहुँचते ही असीम आनंद और आश्चर्यजनक खुशी का अहसास होता है। गौरीकुण्ड से 14 कि.मी. की चढ़ाई चढ़ने के बाद केदारनाथ धाम पहुचते ही थका हुआ तीर्थयात्री हिमालय पवर्त की बर्फ से ढकी हुई सफेद पहाड़ी पक्तियों के मध्य केदारनाथ मन्दिर को देख आश्चर्यचकित रह जाता है । मन्दिर को दूर से देखने मात्र से ही उसकी सम्पूर्ण थकान पलभर में गायब हो जाती है। तीर्थयात्री को रोम-रोम में शिव ही शिव महसूस होते है ।

वह क्षण भर में दीन दुनिया को भूलकर “केदारनाथ की जय” “हर-हर महादेव” “जय भोला भण्डारी” के जयघोष करने लगता है। कहा जाता है कि केदारधाम में प्रवेश करने मात्र से ही पापी व्यक्ति को अगले जन्म में शिवलोक की प्राप्ति होती है। ऐसा भी कहा जाता है कि केदारनाथ के दर्शन करने से उस व्यक्ति के सौ पीढ़ियों तक के पितर शिवलोक में चले जाते है। गरुड़ पुराण के अनुसार केदारधाम सम्पूर्ण पापों को नाश करने वाला है।

स्कन्द पुराण में केदारनाथ धाम की महिमा के सम्बन्ध में एक अन्य कथा का भी उल्लेख है जिसमें महादेव शंकर ने माता पार्वती को एक कथा सुनाई उन्होंने कहा कि एक गांव में एक मांसाहारी बहेलिया रहता था जिसे हिरण का मांस बहुत प्रिय था इसके लिये वह प्रतिदिन हिरण का शिकार कर उन्हें अपना आहार बनाता था एक दिन वह हिरण के शिकार के लिये घर से निकला और हिरण को तलाशते हुये केदारधाम क्षेत्र तक आ गया। वह हिरण की तलाश में जंगली पर्वत पर घूम रहा था उसी समय उधर से नारद मुनि गुजरे उसने नारद मुनि को हिरण समझ लिया क्योंकि उस समय अंधेरा हो चुका था तथा दूरी भी अधिक थी। बहेलिया नारद मुनि को हिरण समझ कर उनका शिकार करने की तरकीव सोच ही रहा था कि तब तक सूर्यास्त हो गया। अतः वह अपना बाण शिकार हेतु न चला सका। बहेलिया थोड़ा सा आगे बढ़ा ही था कि

उसने देखा कि एक मेंढ़क को साँप ने निगल लिया, किन्तु वह मृत्यु प्राप्त मेंढक शिव के स्वरूप में हो गया। जब बहेलिया जंगल में थोड़ा और आगे गया तो उसने देखा कि एक बाघ ने हिरण को मार डाला हिरण मरते ही शिवगणों के साथ शिवलोक में चला गया यह सब देखकर बहेलिया आश्चर्य चकित हो रहा था इतने में ही मुनि नारद बहेलिया के पास पहुँच गये।

साधारण मनुष्य के रूप में अपने पास नारद मुनि को देखकर बहेलिये ने उनसे उन घटनाओं के संबंध में जानकारी जानना चाहत मुनि नारद ने उससे कहा कि तुम परम सौभाग्यशाली हो जो इस पावन तीर्थ पर पधारे हो इस शुभकारी कल्याणकारी क्षेत्र में तुम्हारे देखते-देखते ही निकृष्ट जीव भी शिव तत्व को प्राप्त हो गये है। यह सुनकर घोर आश्चर्य में पड़ते हुये उस बहेलिये ने नारद मुनि के चरणों में दण्डवत करते हुये अपने उद्धार हेतु विनती की तब नारदमुनि ने उसे भगवान शिव के संबंध में उपदेश तथा निर्देश दिये। नारद जी के निर्देशानुसार वह बहेलिया उसी केदारखण्ड में रहकर भगवान शिव की भक्ति में लग गया और अन्त में परमगति को प्राप्त हुआ।

केदारनाथ मंदिर लगभग 80 फीट ऊँचा है। यह मंदिर एक ही आकार के भूरे रंग के पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर के ऊपरी हिस्से पर लकड़ी की छत्री है। इस छत्री के ऊपरी भाग पर ताँबे की पर्त लगी हुई है। छत्री के ऊपर ताँबे का कलश है। इस कलश पर सोने की पालिश की गयी है।

केदारनाथ का मन्दिर समुद्रतल से 3581 मीटर की ऊँचाई पर मंदाकिनी घाटी के अन्तिम छोर पर हिम श्रृंखलाओं के मध्य एक छोटे से समतल स्थल पर स्थित है। केदारनाथ जी के मन्दिर की दक्षिण पहाड़ी के शिखर पर भैरव जी का मन्दिर स्थित है । यहाँ से हिमालय पर्वत का अत्यंन्त मनोहारी दृश्य दिखाई देता है । यहाँ पर भैरव शिला है जिसके ऊपर भैरव जी की प्रतिमा है। शीतऋतु में जब श्री केदारनाथ मंदिर के पट बंद हो जाते है तब भैरवनाथ जी ही इस क्षेत्र की देख-रेख करते है।

केदारनाथ मन्दिर के समीप ही हंस कुण्ड है। जहाँ पर शृद्धालुओं द्वारा अपने पितरों की मुक्ति हेतु श्राद्ध-तर्पण किया जाता है। यह वह स्थान है। जहाँ पर ब्रम्हा जी ने हंस के रूप में रेतपान किया था। इसी कारण इस स्थान का नाम हंस कुण्ड पड़ा।

रेतस कुंड स्थान केदारनाथ मंदिर से भैरव मंदिर की ओर जाते । समय कुछ दूरी पर पड़ता है। इसे रति कुंण्ड भी कहा जाता है। जब शिव जी ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म किया था तब कामदेव की पत्नि रति के आँसू इसी स्थान पर गिरे थे इस कारण इसे रतिकुण्ड भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि इस कुण्ड में “ॐ नमः शिवाय” का उच्चारण किया जावे तो पानी के बुल-बुले उठते दिखाई देते है।

इन प्रमुख धार्मिक स्थलों के अलावा केदारनाथ मंदिर के पीछे अमृत कुण्ड तथा थोड़ी सी दूरी पर शंकराचार्य की समाधि है। इसके अलावा यहाँ उदक कुण्ड, ईशानेश्वर महादेव, चौरावड़ीताल, वासुकीताल भी देखने योग्य है। स्कन्दपुराण में भगवान शिव ने केदारधाम की महिमा के संबंध में माँ पार्वती से कहा है कि जो प्राणी अपने निवास पर रहते हुये भी केदारखण्ड की यात्रा के लिये विचार करता है उसकी कई पीढ़ियों के पितर शिवलोक में निवास प्राप्त कर लेते हैं।

जो प्राणी मन, वाणी और कर्म से मेरे प्रति समर्पित होकर श्री केदारेश्वर के दर्शन करता है तो उसे यदि ब्रह्म हत्या के समान भी पाप लगा हो, वे सभी पाप यहाँ के दर्शन मात्र से ही नष्ट हो जाते हैं जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, गऊओं में कामधेनु और सभी पुरियों में कैलाश श्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है । शिवपुराण के अनुसार जो प्राणी केदारधाम पहुँचकर वहाँ महादेव के केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का पूजन कर वहाँ पवित्र जल पी लेता है उस प्राणी का पुनर्जन्म नहीं होता ।

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