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kaise samudra ke andar bichti hain internet cable?

Internet Cable – जरा सोचिए आज और अभी आपका इंटरनेट बंद हो जाए तो आप क्या करेंगे? तो चलिए जरा यह सोचकर देखते हैं कि, अगर इस दुनिया की पूरी कनेक्टिविटी हमेशा-हमेशा के लिए चली जाए तो इस दुनिया का क्या होगा? जरा सोच कर देखिए।

आपका मोबाइल, मोबाइल नहीं बल्कि, माचिस की डिब्बी बन जाएगा। जितने भी बैंक हैं, उनके सामने लंबी-लंबी कतारें लग जाएंगी क्योंकि, अब बैंक को कनेक्टिविटी ना मिलने की वजह से सारे काम मेनूवली करने पड़ेंगे।

ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के बारे में सोच कर देखिए बड़ी-बड़ी शॉपिंग कंपनियों के मालिक जो आज करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं उनका क्या होगा?अच्छा चलिए जरा उन भोले भाले लोगों के बारे में सोच कर देखिए जो, रोज सुबह-सुबह अपनी सेल्फी पोस्ट करते हैं। इन भोले-भाले लोगों की तो जिंदगी बेजान हो जाएगी। इंटरनेट आज के समय में हमारे लिए क्या है, यह समझ आ गया होगा आपको। लेकिन क्या आपके मन में कभी विचार आया कि आखिर यह चलता कैसे हैं? कहां से आता है यह इंटरनेट?

इंटरनेट केबल क्या होता है?

बादलों में छुपे किसी सेटेलाइट की मदद से इंटरनेट पहुंचता है नहीं। असल में आज दुनिया में 90% इंटरनेट समुद्र की गहराई से होकर गुजरता है। जी हां, सही सुना आपने समुद्र की गहराई से होकर। तो चलिए जानते हैं। इंटरनेट को समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। जब दो या दो से अधिक कंप्यूटर को आपस में जोड़ा जाता है तो, एक कनेक्शन बिल्ड होता है ताकि, एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर में डाटा ट्रांसफर किया जाए। बस यह समझ लीजिए कि, इसी को इंटरनेट कहते हैं। जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई?

इंटरनेट केबल की शुरुआत और इतिहास?

सन् 1969 में जब इंसान ने चांद पर अपना पहला कदम रखा था तब, यूएस के रक्षा कार्यालय ने रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी “ARPA” को नियुक्त किया। उस वक्त 4 कंप्यूटर का नेटवर्क बनाया गया जिसमें, उन्होंने डाटा एक्सचेंज करने का जरिया निकाल लिया। इसके बाद इसे कई एजेंसियों के साथ जोड़ा गया। धीरे-धीरे इसका नेटवर्क बड़ा होता गया और फिर यह आम लोगों के लिए ओपन हो गया। अब आम इंसान भी इंटरनेट का उपयोग कर सकता था लेकिन, अब प्रॉब्लम यह थी कि, इसे दुनिया तक कैसे फैलाया जाए? तब सेटेलाइट की मदद ली गई लेकिन इस टेक्नोलॉजी से इंटरनेट की स्पीड काफी कम थी।

आपको याद होगा कुछ समय पहले कैसे इंटरनेट चलता था। एक वेब पेज को खोलने में 5 मिनट का समय लग जाता था। लेकिन आज चुटकी भर में सब कुछ हो जाता है। जैसे जैसे इंटरनेट की स्पीड बढ़ती गई वैसे-वैसे फास्ट इंटरनेट की मांग हर जगह बढ़ती चली गई। इसके बाद संपूर्ण दुनिया को जोड़ने के लिए इंजीनियर ने तरकीब निकाली। फिर समुद्र के अंदर लंबे-लंबे केबल बिछाई गई जिसे “सबमरीन केबल” कहा जाता है। 90% इंटरनेट आज इन्हीं केबिल के जरिए दुनिया में भेजा जाता है और दुनिया इस्तेमाल करती है। सिर्फ 10% परसेंट सेटेलाइट की मदद से हासिल होता है जो आप और हम हासिल नहीं कर सकते। इस तरह के इंटरनेट को दुनिया के कुछ खुफिया एजेंसी ही इस्तेमाल कर सकती हैं वह बात अलग है कि, एलोन मस्क (Elon Musk) सेटेलाइट सेवा आम जनता के लिए शुरू करने वाले हैं।

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सबमरीन केबल

अब तो आपको समझ आ गया होगा कि पहले इंटरनेट इतना स्लो और आज इतना फास्ट कैसे चलता है। यह सब संभव हुआ इस समुद्र में बिछाए गए इन सबमरीन केबल की वजह से। क्या आप जानते हैं कि, एक देश को दूसरे देश से जोड़ने के लिए कितना केवल लगता है? जानकर हैरान रह जाएंगे आप, आपको बता दें कि, पूरी दुनिया में 8 लाख किलोमीटर केबिल दुनिया भर में समुद्र के अंदर बिछाए गए हैं। जो अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं।

लेकिन इन केबल को बिछाना कोई आसान काम नहीं है। इनको बिछाने में इंजीनियर को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कुछ नेचुरल कैलेमिटी इन केबिल को पूरी तरह तबाह कर देती हैं। जिसके बाद समुद्र की गहराई में एक लंबा मेंटेनेंस वर्क चलता है।

मरीन शिप

आज समुद्र के अंदर इनके भी उसको बिछाने के लिए कुछ गिनी चुनी कंपनियां ही मौजूद हैं जिन्हें tier1 कहा जाता है। इन कंपनियों के पास एक खास तरह की मरीन शिप होती है जो, समुद्र के अंदर केबल बिछाने का काम करती है। लेकिन इससे पहले यह जान लीजिए कि, यह कोई आम केबिल नहीं होती, एक खास तरह की केवल होती है, जिसे लंबे समय तक पानी के अंदर रहने योग्य बनाया जाता है। इस केबिल की चौड़ाई 17 एमएम तक होती है। जिसके अंदर बहुत सारे परत होती हैं। सबसे पहली परत में फाइबर ऑप्टिक होता है, इसकी वजह से इंटरनेट आप तक पहुंचता है। लेकिन उसकी सुरक्षा करने के लिए उसके ऊपर कई सारी परत लगाई जाती हैं। इसके बाद रब्बर स्टील और तरह-तरह की परत लगाई जाती हैं, ताकि समुद्र के अंदर यह केवल सुरक्षित रहे।

इसके बाद भी कई बार केवल से टूट जाते हैं। कई बार बड़ी-बड़ी शार्क मछलियां इन केबल को चबाकर तोड़ देती हैं, और कई बार कुछ शरारती तत्व इन्हें काट देते हैं। 2013 में बिल्कुल ऐसा ही हुआ था। कुछ शरारती तत्वों ने यूरोप अमेरिका पहुंचने वाले केबल को काट दिया था। इससे वहाँ इंटरनेट स्पीड 60% कम हो गई थी। इसलिए आज के समय में समुद्र में जितने भी केवल बिछाए जाते हैं वह सार्क प्रूफ बिछाए जाते हैं। इनमें सार्क प्रूफ रैप लगाया जाता है। जिससे सार्क इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती।

रोबोट का इस्तेमाल –

इतना ही नहीं अब केबिल को दो-तीन ग्रुप में बिछाया जाता है ताकि, अगर एक केबल टूट जाए तो दूसरा काम कर सकती है। इन केबल की निगरानी करने के लिए बहुत सारी टीमें नियुक्त की गई हैं। जब कभी कोई केवल टूट जाता था तो, पहले के समय गोताखोर गहराई में उतर कर इसे फिक्स किया करते थे लेकिन, आज के समय इसकी खराबी का पता लगाने के लिए रोबोट का इस्तेमाल किया जाता है। यह खास तरह के रोबोट होते हैं, जो बड़ी आसानी से पता लगा लेते हैं कि कहां पर केवल टूटा है। पता लगाने के बाद रोबोट इसे फिक्स भी कर सकते हैं। कई बार सुनामी और जहाजों के लंगर की वजह से भी केवल टूट जाते हैं।

हाई प्रेशर वॉटर जेट

इसलिए आज के समय में जितने भी वायर केबल गहराई में बिछाए जाते हैं उनमें हाई प्रेशर वॉटर जेट (high pressure water jet) तकनीकी का प्रयोग किया जाता है। जिसकी मदद से केबल्स को समुद्र की सतह के अंदर गाड़ दिया जाता है ताकि, किसी भी तरह के समुद्री जीव, सुनामी तथा जहाज के लंगर से इसको कोई नुकसान ना हो। आज के समय में जितनी भी केबल बिछाने वाली कंपनियां हैं वह 1 दिन में 200 किलोमीटर केबिल बिछाती हैं। जिसकी वजह से आज समुद्र में बहुत बड़ा केबिलों का जाल बन चुका है। धीरे-धीरे इसे बढ़ाया जा रहा है। यानी कि भविष्य में इंटरनेट स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी।

वैसे दोस्तों क्या आपको पता है समुद्र में इसे सबसे पहले कब बिछाया गया था?

सन 1954 में सबसे पहले समुद्र के नीचे केवल बिछाया गया तब न्यू-फाउंडलैंड और आयरलैंड के बीच एक टेलीग्राफ के बिल बिछाया गया था। इसके बाद समय के साथ-साथ इंटरनेट की मांग बढ़ती गई केबल बिछाए जाते गए। लेकिन जैसे-जैसे केवल बिछाई जा रहे थे इनकी रेंज धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। यानी कि जहां पर 1GB की स्पीड मिलनी थी अब 512 एमबीपीएस की स्पीड मिल रही थी। इंजीनियर को समझते देर नहीं लगी कि थोड़ी थोड़ी दूरी पर केबल्स के बीच में एंपलीफायर लगाना पड़ेगा।

केबल जंक्शन –

वैसे आपको बता दें कि, सबसे बड़ा केबल जंक्शन सिंगापुर से निकलता है जहां पर16 केबल गुजरती हैं। जो पूरी दुनिया को एक दूसरे से जोड़ती हैं और फिर मुंबई भारत। अब आपके दिमाग में एक सवाल आ रहा होगा कि, अगर समुद्र में केबल बिछाने के लिए पहले से ही कंपनियां मौजूद हैं तो फिर जिओ, एयरटेल इन्हें कैसे नेट मिलता है? यह कैसे हम तक इंटरनेट पहुंचाते हैं?

भारत में इसका विस्तार –

असल में जो यह केबल बिछाने वाली कंपनियां हैं यह इनसे इंटरनेट खरीदते हैं और आप तक पहुंचाते हैं। जियो और एयरटेल जैसी कंपनियों का भी खुद का केबल नेटवर्क है। आज के समय में सबसे बड़ा नेटवर्क ग्रुप टाटा ग्रुप (Tata Group) का है। फिर दूसरे नंबर पर आता है रिलायंस (Relience) का। जिसने हाल ही में समुद्र में 25000 किलोमीटर लंबा केबल नेटवर्क बिछाया है। इसी की मदद से आज आपको जिओ (Jio) में बेहतरीन स्पीड मिलती है।

कुछ समय बाद अब रिलायंस इसी केबिल नेटवर्क का विस्तार करके भारत को सिंगापुर, थाईलैंड और मलेशिया से जोड़ने वाला है, वही दूसरा अफ्रीका, मध्य अफ्रीका और इटली से जोड़ने का काम करेगी। आने वाले कुछ समय में आपकी स्पीड 2 Tbps यानी कि, 2 Terabite पर सेकंड होगी। आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि यह कितनी ज्यादा इंटरनेट स्पीड होती है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि, भारत में जल्द से जल्द 5G लॉन्च किया जा सके। जिस तरीके से जिओ (jio) के आने के बाद भारत में एक इंटरनेट क्रांति आई ठीक उसी तरह 5G के आते ही आप एक नया भारत देखने वाले हैं।

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