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हरिद्वार से यमुनोत्री कैसे पहुंचे? | यमुनोत्री यात्रा संपूर्ण जानकारी

यमुनोत्री यात्रा संपूर्ण जानकारी –

उत्तराखण्ड चार धाम यात्रा का प्रारम्भ तीर्थ यात्री सबसे पहले श्री यमुनोत्री जी की यात्रा से शुरू करते है । यमुनोत्री हरिद्वार से 246 कि.मी. की दूरी पर, 3323 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है । हरिद्वार से ऋषिकेश होते हुये यमुनोत्री की यात्रा इस प्रकार प्रारम्भ की जाती है ।

यहाँ पर एक बहुत बड़ा बिजलीघर बनाया जा रहा है जिसके लिये लगभग ३०० करोड़ की लागत का एक बांध बनाया गया है। यह एशिया की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन परियोजना है। इस कारण पुराना टिहरी नगर लगभग जल में डूब चुका है। नई टिहरी पुरानी टिहरी से और अधिक ऊँचाई पर बसी हुई है। नई टिहरी को एक सुन्दर पहाड़ी भ्रमण स्थल के रूप में जाना जाता है ।

हरिद्वार से यमुनोत्री कैसे पहुंचे
हरिद्वार से यमुनोत्री कैसे पहुंचे

श्याना चट्टी टिहरी से धरासू बरकोट होते हुये १२१ कि.मी. की दूरी पर यमुना नदी के तट पर बसा हुआ एक खूबसूरत स्थान है स्याना चटटी । यहाँ ठहरने एवं खाने की उचित व्यवस्था है।

हिमालय पर्वत के उत्तराखण्ड क्षेत्र में यमुनोत्री अपने स्त्रोत कालिंद पर्वत से अवतरित होती है। यह उद्गम स्थल 4421 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है किन्तु यमुना जी का मन्दिर इस स्थान से पहले ही 3165 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस प्राचीन यमुना मन्दिर को वर्तमान में नया रूप प्रदान किया गया है। यमुना जी का उद्गम स्थल अत्याधिक दुर्गम कठिन चढाई पर स्थित है। यमुनोत्री मन्दिर से 10 कि.मी. की विकट चढ़ाई के बाद सप्तऋषि कुण्ड सरोवर मिलता है। यही यमुनोत्री का उद्गम स्थल है। इसका मार्ग घना जंगली एवं ढलानी हैं, कहीं-कहीं ग्लेशियर भी दिखाई देते है। यहाँ दुर्लभ ब्रह्म कमल फूल दिखाई देते हैं।

जानकी चट्टी –

श्याना चट्टी से १२ कि.मी. दूरी पर जानकी चटटी है जो कि यमुनोत्री की यात्रा करने वालों के लिये बस, मोटर गाड़ियों का अन्तिम पड़ाव है। यहाँ से सभी यात्रियों को यमुनोत्री मन्दिर तक पैदल यात्रा करना होती है। यहाँ से ६ कि.मी. दूरी पर यमुनोत्री मन्दिर है। यहाँ जो यात्री पैदल यात्रा नहीं कर सकते उनके लिये खच्चर, कुली, डांडी, कण्डी की व्यवस्था है । यहाँ रहने व खाने की उचित व्यवस्था है । यहाँ से यमुनोत्री की कठिन चढाई प्रारम्भ होती है । ६ कि. मी. की कठिन यात्रा के बाद यात्री यमुनोत्री जी के पावन धाम पर पहुँच है।

नरेन्द्र नगर –

नरेन्द्र नगर ऋषिकेश से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित है । ऋषिकेश में मुनी की रेती नामक स्थान से बस अथवा टैक्सी के द्वारा यात्रा प्रारम्भ की जाती है। नरेन्द्रनगर, नरेन्द्रशाह बहादुर की सन् 1920 में बसाई हुई नगरी है अतः उन्हीं के नाम पर इसे नरेन्द्र नगर कहा जाता है । यह एक पहाड़ पर स्थित मनोरम स्थान है। यहाँ से गंगा, ऋषिकेश, हरिद्वार एवं सूर्यास्त के मनोहारी दृश्य दिखाई देते है ।

चम्बा –

ऋषिकेश यमुनोत्री मार्ग पर दूसरा महत्वपूर्ण स्थान चम्बा पड़ता है जो कि ऋषिकेश से 62 कि.मी. की दूरी पर तथा नरेन्द्रनगर से 46 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह प्राकृतिक दृष्टि से बहु सुन्दर स्थान है गर्मियों के मौसम में यह स्थान अत्याधिक सुहावना हो जाता है। । 1676 मी० की ऊँचाई पर वनों से घिरा चम्बा एक आदर्श विश्राम स्थल है यदि मौसम साफ हो तो यहाँ से हिमालय पर्वत की बर्फ से ढकी हुई चोटियाँ स्पष्ट दिखाई देती है

टिहरी :- चम्बा से 21 कि.मी. की दूरी पर टिहरी शहर स्थित है। यह भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर 770 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है टिहरी नगर पुराने गढ़वाल राज्य की राजधानी थी, जिसे हिमाचल के राजा सुदर्शन शाह ने बसाया था यहाँ पर अनेक प्राचीन इमारतें व मन्दिर हैं ऐसी मान्यता है कि गढ़वाल राजाओं की पुकार पर भगवान बद्रीनाथ प्रत्यक्ष दर्शन दिया करते थे । यहाँ आदि बद्रीनाथ का एक मुख्य मन्दिर है।

हरिद्वार – यमुनोत्री यात्रा हेतु – सामान्य जानकारी

वायुमार्ग –

हवाई अड्डा जौली ग्राट, देहरादून से 40 कि०मी० तथा ऋषिकेश से 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ से नियमित उड़ाने नहीं होती है ।

रेलमार्ग –

ऋषिकेश, हरिद्वार रेल्वे स्टेशन एवं देहरादून रेल्वे स्टेशन इन तीनों रेल्वे स्टेशन से दिल्ली एवं अन्य स्थानों के लिये प्रतिदिन रेलगाड़ियाँ उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग –

यमुनोत्री सड़क मार्ग से हरिद्वार, ऋषिकेश, एवं देहरादून से जुड़ा हुआ है। हरिद्वार से यमुनोत्री 246 कि.मी., ऋषीकेश से 222 कि.मी. तथा देहरादून से 175 कि.मी. है। जानकी चट्टी से यमुनोत्री की 6 कि०मी० की दूरी पैदल तय करना होती है।

ऊँचाई –

यमुनोत्री उत्तराखण्ड के हिमालय पर्वत पर 3165 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जलवायुः- ग्रीष्म ऋतु में दिन में मौसम सुहावना व रात्रि में ठण्ड रहती है । शीत ऋतु में यह स्थान बर्फ से ढका रहता है। यहाँ का तापमान शून्य हो जाता है। अप्रैल से अगस्त तक रात्री में हल्के ऊनी वस्त्र तथा सितम्बर से नवम्बर के बीच भारी ऊनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता है।

भाषा –

यहाँ के निवासी हिन्दी और गढ़वाली भाषा का प्रयोग करते है । कुछ व्यक्ति आवश्यकतानुसार अंग्रेजी का भी प्रयोग करते है।

भ्रमणकाल –

अप्रैल से मध्य नवम्बर तक। जुलाई अगस्त में वर्षा के कारण यात्रा में थोड़ी परेशानी होती है।

यमुनोत्री की उत्पत्ति –

यह एक दुर्लभ स्थान हैं। अतः सामान्यतः श्रद्धालु यात्री यहाँ की यात्रा नहीं करते और वे इसके दर्शन से वंचित रह जाते हैं। जिस प्रकार विश्व के सभी जीवों को पापमुक्त करने वाली जगत जननी पावन गंगा मां विष्णु भगवान के पैर के अंगूठे से उत्पन्न हुई है। उसी प्रकार यमुना जी भगवान विष्णु के आँसूओं से उत्पन्न हुई है। सूर्य भगवान की पत्नी संज्ञा जो कि विश्वकर्मा की पुत्री थीं के तीन सन्तान उत्पन्न हुई। इनमें पुत्री यमुना व पुत्र यम जुड़वा भाई-बहन थे।

जबकि श्राददेव छोटे पुत्र थे। यमुना जी की विमाता के पुत्र शनि है जो कि यमुना जी के सबसे छोटे भाई हैं, यमुना जी की विमाता मां संज्ञा की छाया थी। इसी कारण बहुत से मनुष्य शनि के दुष्प्रभाव से बचने के लिये यमुना जी के मंदिर के सम्मुख शनि स्त्रोत का पाठ करते है। जो मनुष्य यमुनोत्री धाम में यमुना जी के मंदिर में शनि स्त्रोत का पाठ करते हैं उन्हें सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

यमुनोत्री
यमुनोत्री

पुराणों के अनुसार त्रेता युग के अन्तिम काल में तथा द्वापर युग के प्रथम भाग में जयमुनी नामक ऋषि ने हिमालय के कालिन्द पर्वत पर यमुना जी की तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर यमुना जी एक पतली सी जलधारा के रूप में कालिन्द पर्वत से प्रकट हुई। माता यमुना जी ने जयमुनी को तपस्या के फलस्वरूप यह भी वरदान दिया कि यमुना जी को उनके नाम पर जमुना के नाम से भी लोग याद करेंगे और उनकी पूजा करेंगे। ऋषि जयमुनी के आग्रह पर यमुना जी यहाँ गर्म जलधारा के रूप में भी प्रकट हुई हैं।

पुराणों के अनुसार देवताओं ने जब यम को धर्मराज की गद्दी प्रदान की थी तब यमुना जी ने यम से यह वरदान प्राप्त किया था कि आप उन सभी पापी मनुष्यों पर तब तक अपना अधिकार बनायें रखना जब तक वह मेरी पावन धारा में स्नान न कर लें, यमुना में स्नान करने के बाद तुम उन सभी पापी मनुष्यों के समस्त पापों को क्षमा कर देना। इसी कारण जो भी मनुष्य यमुनोत्री में यमुना जी में स्नान करके उनकी पूजा

अर्चना करता है, उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है। ऐसा व्यक्ति कभी यमलोक नहीं जाता उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। सूर्य की पुत्री होने के कारण सूर्यग्रहण के समय यमुनोत्री में स्नान करने पर कुरूक्षेत्र एवं काशी में स्नान एवं पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है उससे करोड़ों गुना अधिक फल यहाँ प्राप्त होता है। यहाँ स्थित तप्तकुण्ड (सूर्यकुण्ड) में स्नान करने से समस्त प्रकार के कुष्ठ एवं चर्म रोग समाप्त हो जाते हैं।

जो व्यक्ति श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इस कुण्ड में स्नान करते हैं उन्हें सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति यहाँ सूर्यनारायण की पूजा करता है, अन्नदान, वस्त्रदान एवं धन दान करता है, उसे सूर्य भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है । यहाँ पर स्नान करने वाला ब्रह्म हत्या तथा गोत्र हत्या के पाप से भी मुक्ति प्राप्त है करता है। यमुनोत्री मन्दिर प्राकृतिक प्रकोपों (ग्लेशियर आने से ) से कई बार ढहा है प्राचीन यमुनोत्री मन्दिर टिहरी नरेश महाराज प्रताप शाह ने विक्रमी सम्वत १६१६ में बनवाया था।

यह मन्दिर अब मिट चुका है वर्तमान मन्दिर को कलकत्ता के सेठ जालान के आर्थिक सहयोग से बनाया गया हैं। वर्तमान यमुना जी के मन्दिर के अन्दर यमुना देवी की एक छोटी सी मूर्ति है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में यमुनोत्री का अपना एक विशेष स्थान है । यह ऋषि मुनियों की तप स्थली है। यमुना जी में केवल स्नान मात्र से ही प्राणी यमलोक से छूट जाता है, उसके सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है । एक पौराणिक कथा के अनुसार यह शांत स्थान आसित मुनि का निवास रहा है।

यमुनोत्री में आकर यात्रियों को भगवान द्वारा रची हुई इस पृथ्वी की विचित्रता का अहसास हो जाता है कि यमुनोत्री में एक तरफ यमुना जी की पवित्र शीतल धारा बह रही है वहीं दूसरी ओर गर्म जल के स्त्रोत है यमुना जी का यह मन्दिर धर्मयात्रियों के लिये प्रतिवर्ष अप्रैल अथवा मई माह में अक्षय तृतीया को खुलता है जो कि दीपावली तक खुला रहता है दीपावली की दूज के दिन मन्दिर के पट बन्द हो जाते है। इसके बाद यमुनोत्री जी का शीतकालीन निवास स्थान खरसाली नामक ग्राम में होता है शीतकाल में यहीं पर यमुनोत्री जी की पूजा अर्चना की जाती है।

यमुनौत्री मन्दिर के प्रांगण में एक विशाल शिलास्तम्भ है जिसे दिव्य शिला के नाम से पुकारा जाता है। यमुना जी के जल की शुद्धता एवं पवित्रता के कारण भक्तों के मन में यमुना जी के प्रति अथाह श्रद्धा है । यमुना जी के मन्दिर के बगल में ही सूर्य कुण्ड है यह गर्म पानी का मुख्य स्त्रोत है इस पानी का तापमान अत्याधिक होता है श्रद्धालु तीर्थ यात्री इसी खौलते हुये पानी के कुण्ड में चावल व आलू पकाकर यमुनादेवी को प्रसाद समर्पित करते है । जो तीर्थ यात्री तथा श्रद्धालु यमुना जी में स्नान करके यमुनोत्री में तीन रात्रि का निवास करके पूजा अर्चना करता है उसके सम्पूर्ण पाप जलकर नष्ट हो जाते है।

यमुनोत्री मन्दिर के आसपास देवदार और चीड़ के हरे-भरे घने जंगल फैले हुये हैं यहाँ की हरियाली तथा पहाड़ों के बीच बहती हुई यमुना की धारा मन को मोह लेती है । मन्दिर तक जाने का मार्ग दुर्गम एवं कठिन तथा रोमांचकारी है।

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